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क्या अलग राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की संस्कृति में भी बदलाव आ रहा है?

1 नवंबर सन 2000 को हमारा छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश से अलग हुआ था। इस महीने को राज्य के बने हुए 21 साल हो गए। छत्तीसगढ़ एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है। राज्य बनने के बाद से आदिवासियों के जीवन में भारी बदलाव आया है, चाहे बात उनके रहन-शहन की हो, खान-पान की हो या सम्पूर्ण संस्कृति की हो।


हमने इन 21 सालों में हुए बदलाव को लेकर बिंझरा के मुखिया से बातचीत किए। उन्होंने बताया कि पहले की तुलना में गाँवों में विकास का काम अधिक हुआ है। गाँव के ही एक और व्यक्ति ने हमें बताया कि, पहले और आज के दौर में बहुत बदलाव आया है। पहले लोग एक दूसरे के ज्यादा करीब थे और उनमें सामुदायिकता की भावना ज्यादा थी, उनमें मेलजोल भी ज्यादा थी, सभी कोई एक दूसरे के साथ जुड़कर अपना जीवन व्यतीत करते थे। गाँव तथा जंगलों में रहने वाले आदिवासियों का जीवन बहुत अधिक सरल था। अब जैसे-जैसे आधुनिकता बढ़ रही है, वैसे-वैसे आदिवासियों का जीवन भी जटिल होता जा रहा है, एवं उनके आपस में भी तेज़ी से प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।


रोजगार के मामले में अगर बात की जाए तो पहले लोग जंगलों की संसाधनों पर ही आश्रित थे और उनसे ही अपना जीवनयापन करते थे। मुख्यधारा का रोजगार न होते हुए भी वे खुश रहा करते थे। लेकिन अब के दौर में बेरोजगारी मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है अब के दौर में जितनी ज्यादा उन्नति हो रही है उतनी ही ज्यादा बेरोजगारी भी बढ़ती ही जा रही है। गाँव के ही कुछ लोगों से चर्चा करने पर पता चला कि हर साल गाँव के लगभग 20 से 25 आदिवासी शहर की ओर काम के लिए पलायन करने लगे हैं। अब तो स्थिति यह है कि, काम करने गए लोग शहर में ही बसने लगे हैं। अब गाँव याजंगलों की स्थिति भी इतनी सुविधाजनक नहीं रही कि वहाँ उनका जीवनयापन हो सके, ऐसे में लोग भी पलायन करने को मजबूर हैं। कोरबा जिले में ही आदिवासियों की आबादी 51. 67 % है जिसमें से हर साल लगभग 20% लोग शहर की ओर पलायन करने लगे हैं। गाँव में अगर रोजगार की ऐसे ही किल्लत बनी रही तो बहुत जल्द गाँव के गाँव ही खाली हो जायेंगे। शहरों में भी ऐसा नहीं है कि आदिवासियों को बहुत सम्मानजनक काम मिलता है, अधिकतर जगहों पर वे मज़दूरी करते हुए ही मिलेंगे। वे भी मजबूरी में अपने परिवार का भरण-पोषण के लिए मज़दूरी करने को विवश हैं।


छत्तीसगढ़ का मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद आदिवासियों के जीवनशैली में जो बदलाव आया है, उसके बारे में गाँव के कुछ बुजुर्गों ने हमें बताया कि, पहले आदिवासियों में अपनी संस्कृति के प्रति जागरूकता की कमी थी, वे अपने अनोखे परम्पराओं को निभा तो रहे थे पर उनके पिछे की वजह क्या है? इसकी जानकारी बहुत ही कम लोगों को थी। जैसे रहन-सहन और वेशभूषा के प्रति लोग इतने ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। परंतु अब अलग-अलग आदिवासी संगठनों के जरिये लोग अपनी संस्कृति को जानने समझने लगे हैं। उदहारण के लिए गोंडी समाज को ही ले लीजिए। पहले अपने समुदाय के कार्यक्रमों में गोंडी लोग अपने वेश भूषा का उतना ख्याल नहीं रखते थे, और कुछ भी कपड़ा पहन कर शामिल हुआ करते थे। परंतु अब जागरूकता इतनी बढ़ गई है कि, अब हर कार्यक्रम में लड़कों को सफेद धोती और पीले रंग का गमछा तथा लड़कियों को पीले रंग की साड़ी पहने हुए देखा जा सकता है। पिला रंग गोंडी समुदाय की पहचान है, यह बात अब लोगों को भली भाँति पता चलने लगा है।

पिले रंग के वेश भूषा के साथ नृत्य करते गोंडी समुदाय के लोग

जब छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश से अलग हुआ उसके बाद जोरों से विकास का काम हो रहा है और जीवनशैली भी तेज़ी से बदल रही है। ऐसे में रोजगार की वजह से और अपने जीवन को अधिक सुविधाजनक बनाने हेतु लोग शहर की ओर तेज़ी से पलायन कर रहे हैं। ऐसे में उनका रहन-सहन, वेश भूषा आदि में भी परिवर्तन आ रहा है। यदि लोगों के बीच आदिवासी रीति रिवाजों और परंपराओं के प्रति जागरूकता नहीं बढ़ाई गई तो पूरी संस्कृति के लोप हो जाने का खतरा है।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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