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थुहा वृक्ष के डगाली के उपयोग के बारे में जानें

पंकज बांकिरा द्वारा सम्पादित


हमारे छत्तीसगढ़ में अनेकों पेड़-पौधे हैं और उनमें से एक खास वृक्ष है, थुहा। इस वृक्ष की डाली से हमारे आदिवासी लोगों को बहुत ही ज्यादा लाभ होता है। थुहा वृक्ष का जो डगाली होता है, वह रोगों के उपचार में काम आता है। गांव के रहने वाले ज्यादातर लोग, बीमार आदि होने पर घरेलू उपाय ही किया करते हैं। क्योंकि, हम आदिवासियों के निवास क्षेत्रों में ऐसे बहुत से पेड़-पौधे होते हैं। जिनसे हमारे कई प्रकारों के बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए, कई संसाधन मिल जाते हैं। और हम उन पेड़-पौधों को रोगों व बीमारियों से निजात पाने के लिए औषधि बनाकर इस्तेमाल कर लेते हैं। जिस प्रकार डॉक्टर के पास जाने से हमारी बीमारियों का हल होता है, ठीक उसी प्रकार गांव के रहने वाले वैधों में ऐसे गुण होते हैं। और उन्हीं के इलाज से हम लोग, अपने छोटे व बड़े बीमारियों से छुटकारा पा जाते हैं।

थुहा का पेड़

थुहा वृक्ष के डगाली को हम लोग काट कर ले लाते हैं और बीमारियों के उपचार में प्रयोग करते हैं। जैसे कि इस बीमार को, घिनही नाम से जाना जाता है। और यह जो बीमारी होता है, यह बीमारी सिर्फ हाथों के उंगलियों में होता है। यह पांच उंगलियों में से किसी एक उंगली पर हो सकता है, इसके होने पर उंगलियों में सूजन हो जाता है और फूलने के बाद उन उंगलियों में घाव हो जाता है। घाव हो जाने के बाद उंगलियों का चमड़ी या मांस कतरा-कतरा जैसा हो जाता है। और अगर इस बीमारी को मेडिकल या डॉक्टर को दिखाया जाता है तो, बहुत ही दर्दनाक इलाज किया जाता है और इसके ठीक होने में बहुत समय लग जाता है। और अगर इस थुहा का डगाली को इसके लिए इस्तेमाल करें तो, तीन-चार दिनों में ही ठीक होने लगता है।

थुहा वृक्ष का डगाली

इस वृक्ष के डगाली को काटने पर बहुत सारा दूध निकलता है। थुहा वृक्ष के डगाली के अंदर का भाग खोखला रहता है। और उसी खोखले में, उंगली को घुसाया जाता है और 2 से 3 घंटे तक उंगली को घुसा के रखना पड़ता है। और ये प्रक्रिया लगातार 2 से 3 दिन तक करना पड़ता है। दो-तीन घंटे तक उंगली को इसलिए घुसा के रखते हैं, ताकि उसका जो लस (दूध) होता है, वह अच्छे से घाव के अंदर मिल जाए। और उसी दूध से हमारे इन बीमारियों से छुटकारा मिलता है।


यह वृक्ष आम, आंवला, बेलवा, तेंदू, सरई आदि वृक्षों की भांति सामान्य रूप से ज्यादा देखने को नहीं मिलता है। आमतौर पर एक गांव या पंचायत में, एक या दो ही वृक्ष देखने को मिलेंगे। और जिन गांवों में यह वृक्ष पाया जाता है, उन गांवों में लोग अकसर घिनही के रोग के उपचार हेतु पहुंच जाते हैं। इस वृक्ष में पत्ते नहीं होते हैं, सिर्फ तना और डाल ही होता है और छोटा-छोटा फुलझर होता है। इस वृक्ष में बहुत ही ज्यादा कांटा होता है, इसके डगाली को हाथों से पकड़ना नामुमकिन है। क्योंकि, हाथ से पकड़ने के लिए, उसमें ऐसा कोई जगह नहीं होता है। इसके कांटे बहुत ही नुकीले होते हैं। हाथ से पकड़ने के लिए, उस डाल को छिलना पड़ता है। छिलने के बाद ही इस वृक्ष के डाली को हाथों में पकड़ना आसान हो पाता है।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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