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आदिवासी गाँव की आत्मनिर्भरता : जानिए कैसे लोग करते हैं ईंट का निर्माण

ईंट बनाने का काम आदिकाल से चलता आ रहा है। ईंट का उपयोग घर, सड़क आदि के निर्माण में किया जाता है। गाँव के कई लोग ईंट बनाकर अपनी आजीविका चलाते हैं। गाँव में लोग आसानी से ईंट बना सकते हैं, क्योंकि ईट बनाने के लिए पर्याप्त जगह, पानी, एवं लकड़ी, की जरूरत पड़ती है, जो गाँवों में अक्सर आसानी से उपलब्ध हो जाता है। ईंट को हम किसी ठेकेदार या किसी भी व्यक्ति को बेच सकते हैं। इसके लिए दुकान की जरूरत नहीं पड़ती एवं कई लोगों को आसानी से रोजगार मिल जाता है। इस प्रकार से गाँवों में आत्मनिर्भरता देखि जाती है।

ईंट बनाने से गांवों में कई युवाओं को रोजगार मिलता है

आइए जानते हैं कामेश कुमार ने हमें ईंट बनाने के बारे में क्या जानकारी दी।


कामेश कुमार ग्राम विजयनगर हरदी, जिला गरियाबंद, छत्तीसगढ़ से हैं। उन्होंने बताया कि उनके गाँव के कई बेरोजगार लोग ईंट बनाकर अपना जीवन यापन करते हैं।


ईंट बनाने के लिए आवश्यक सामग्री :

  • सबसे पहले मिट्टी का चयन किया जाता है। लाल एवं रेतीली मिट्टी इसके लिए उपयुक्त है। इसके अलावा फौड़ा, गैती, टीपा, बाल्टी, रेत, पानी, सांचा आदि की जरूरत पड़ती है।

  • ईंट बनाने के लिए करीब 2000 स्क्वायर फीट समतल भूमि होनी चाहिए। पानी की पर्याप्त व्यवस्था के लिए पास में ही नदी, कुआं, तालाब, नलकूप आदि की व्यवस्था होनी चाहिए।

  • जमीन को समतल करके फड़ बनाया जाता है। फड़ छीलने के बाद ईंट बनाने के लिए मिट्टी की खुदाई की जाती है। अगर सही मिट्टी चयन न हो तो मिट्टी को दूसरी जगह से खोद कर लाया जाता है और फड़ में गिराया जाता है।

  • मिट्टी को 4-5 घंटे पानी में भिगोने के बाद खुदाई किया जाता है या भिगोए हुए मिट्टी को रांपा (फौडा) से पलट दिया जाता है। फिर उस मिट्टी को एक जगह इकट्ठा करते हैं। उसके बाद पॉलिथीन से लगभग 2 घंटे ढ़ककर रखा जाता है। जिससे मिट्टी पूर्ण रूप से बनकर तैयार हो जाती है।

  • मिट्टी के तैयार होने के बाद उस मिट्टी को हाथ से काटते हैं और रेत से मिलाकर सांचा में डालते हैं, फिर दूसरा व्यक्ति उस सांचे को पकड़ कर फड़ में ले जाकर ईंट को सूखने के लिए डालता है। एक तरफ से हल्का सूखने के बाद ईंट को पलट दिया जाता है, जिससे कि ईंट दोनों तरफ़ पूरी तरह से सूख जाए। सूखने के बाद उसे उठाकर लाइन से रख दिया जाता है।

इस तरह से प्रक्रिया चलती रहती है। दो लोग एक दिन में कम से कम 800 से 1500 के बीच ईंट बना लेते हैं। आवश्यकता अनुसार ईंट बनाने के बाद इन्हें पकाया जाता है। पकाने के लिए जिन आवश्यक सामग्री की जरूरत पड़ती है वे हैं, लकड़ी, भूसी, कोयला आदि।

ईट बनाने के लिए पर्याप्त जगह, पानी, एवं लकड़ी, की जरूरत पड़ती है

ईट बनाने के लिए सांचा


ईंट बनाने के लिए सांचे की जरूरत पड़ती है। सांचा बनाने के लिए हल्की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। खम्हार, सायगोन, तोबीजा आदि लकड़ी को काट कर प्लेट जैसा बना कर सांचे का रूप देते हैं। इसके अंदरूनी भाग की लंबाई 9 इंच, चौड़ाई 3 इंच और ऊंचाई 3 इंच होती है। जब सांचे को हम डबल ईट के लिए बनाते हैं, तो लगभग 22 इंच की लंबी प्लेट लगती है। बांकी 3 इंच चौड़ाई और 3 इंच ऊंचाई वैसी ही रहती है। इस तरह बनाए गए ईंट को प्लेट ईंट कहते हैं।

ईंट का ढांचा तैयार हो जाए तो उसे भट्टे में भुना जाता है

ईंट की क्वालिटी :

ईंट बनाने के साथ-साथ उसकी क्वालिटी पर ध्यान देना सबसे जरूरी है।

ईंट की बेहतर क्वालिटी के मिट्टी, रेत, सांचा के साथ हाथ का कमाल भी रहता है। अच्छी ईंट बनाने के लिए, जब भी मिट्टी को काटेंगे तो एक बार में सांचा भर जाना चाहिए। मिट्टी को रेत में लपेटते समय रेत की क्वालिटी देख लेनी चाहिए। रेत हल्की और साफ होनी चाहिए। ईंट को अच्छे से धूप में सूखने दें। ईंट को पकाते समय लकड़ी, कोयला, भूसा आदि ईंधन की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए। ईंट की भट्ठी बनाते समय ईंट रचाने के काम को ध्यान पूर्वक करना चाहिए, ताकि गैस लीक न हो।

ईंट की बिक्री :

ईंट को बेचने के लिए किसी बाजार या दुकान की जरूरत नहीं पड़ती। इसे आसानी से किसी भी जरूरतमंद व्यक्ति को बेच सकते हैं।


शहरों में ईंट की मांग अत्यधिक होने के कारण अच्छा खासा इनकम मिल जाता हैं। शहर के अलावा गाँव में एक ट्रैक्टर ईंट को 3 हजार से 4 हजार रुपए तक बेच सकते हैं। इस तरह गाँव के बेरोजगार लोग ईंट बना कर अपना रोजगार चलाते हैं। इससे उनको परिवार चलने के लिए कुछ आमदनी हो जाती है।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।


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