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जानिए गोंड आदिवासियों के पाठ पिंडी पर्व के बारे में

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिला के अंतिम छोर और उड़ीसा के सीमावर्ती कोमाखान क्षेत्र अन्तर्गत आने वाला गाँव खट्टी (नार्रा), इस क्षेत्र को सुवरमाल के नाम से जाना जाता है। यहाँ के आदिवासी अपनी परम्परा को आज भी संजोकर रखे हुए हैं। आदिवासी अपने जीवन में बहुत ही खुश रहते हैं, और उनका प्रकृति की ओर झुकाव ही उन्हें अलग और अनोखा बनाती है।


नेटी (आडिल ) गोत्रधारी का गढ़ किला धमधा गढ़ है जो कि छत्तीसगढ़ में है। नेटी गोत्र अग्नीवंशी है और इसमें ६ देव वाले आपस में भाई होते जैसे मरकाम, सोरी, सिरसो, नेटी, खूसरो, पोया। पाठ पिंडी पुजा इस वर्ष मनाया गया और लगभग 40 साल बाद यह पूजा किया गया है।

पारम्परिक तरीके से पूजा अर्चना करते लोग

यह कार्यक्रम को चैत्ररई यानी चैत्र माह में मानया जाता है, यह पर्व चैत्र नवरात्र से आरंभ होता है नेटी गोत्र के लोग अपने कुल देवी देवताओं को नमन करते हुए ईष्ट देवी धारनी माता के समक्ष दीप प्रज्वलित कर नवरात्र तक सेवा करते हैं और अंतिम दिवस डोगर (पहाड़) चढ़ाई की जाती है जिसमें पाठ पुजा किया जाता है तथा अपने पुरखा शक्ति का सेवा जोहर एवं अर्जी विनती किया जाता है। डोगर (पहाड़) चढाई के दिन सुबह घर से ध्वजा, पुजा का सामान आदि लेकरबाजा गाजा के साथ आगे बढ़ते हैं, डोगर नीचे सेवा जोहर करके पुजा आरंभ किया जाता है। वहीं पर एक (बाराई) को जीव भाव दिया जाता है और तब डोगर की ऊपर चढ़ते हैं। उपर में मुख्य रूप से सेवा गोगो ही किया जाता है। पुजा समान में नारियल, पानी, अक्ता, धूप-अगरबत्ती, महुआ का फुल, दुध, आदि का प्रयोग किया जाता है। जिस मार्ग से डोगर) चढ़ाई करते हैं उसी मार्ग से वापिस नहीं आया जाता है बल्कि दुसरे मार्ग से निचे उतरा जाता है। पुजा होने के बाद किसी पेड़ पर ध्वजा को लहराया जाता है। मुख्य रूप से कोमर्रा, छतरिया, पूजेरी, सिरहा इनके द्वारा देवी देवताओं के पूजा अर्चना का शुभारंभ किया जाता है, और शाम के समय जिम्मेदारीन माँ (शीतला माता) और गाँव के समस्त देवी देवताओं के गुड़ी के पास जा कर पूजा अर्चना कर धन्यवाद ज्ञापित किया जाता है और प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण कर कार्यक्रम को बड़ी धूमधाम से समापन करते हैं।



आज कल के युवाओं को बहुत कम ही इस प्रकार की पाठ पिंडी पुजा के बारे में जानते हैं, क्योंकि आधुनिक बदलाव के कारण युवा अपने इस जैसे कार्यक्रमों से वंचित होते जा रहें हैं, जबकि यह पीढ़ी दर पीढ़ी सभी को ज्ञात होना चाहिए। इस प्रकार के कार्यक्रम से वंचित होने के कारण ही कई वर्षों बाद यह पाठ पिंडी का पूजा किया गया है। अपनी परम्पराओं को बनाए रखने के लिए हम युवाओं को अपने बड़े बुजुर्गों से जानकारी लेना चाहिए।


उपरोक्त जानकारियां प्राप्त करने में चमन कुमार का सहयोग रहा है।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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