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जानिए बढ़ते तापमान के वजह से कैसे आदिवासियों की कृषि प्रभावित होने वाली है?

Jun 2, 2022
3 min read

आदिवासीयों का जीवन पूरी तरह से प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ है, प्रकृति में यदि थोड़ा भी बदलाव हो तो उसका असर आदिवासियों के जीवन पर पड़ता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी ज्यादातर ग्रामीण इलाकों तथा जंगलों में निवास करते हैं उनके रोजगार के प्रमुख साधन जंगलों से मिलने वाली चीज़ें ही होती हैं। जैसे कि गर्मियों में महुआ, तेंदूपत्ता आदि, वनोत्पाद से जो आमदनी होती है उसका इस्तेमाल बारिश होने पर खरीफ़ फसल लगाने में किया जाता है। लेकिन कभी-कभी इन्हीं जंगलों में रहने वाले जंगली जानवर आदिवासियों को भारी नुकसान पहुँचाते हैं जिससे आदिवासियों के जन जीवन पर बहुत पड़ता है। आजकल जंगली जानवर कुछ ज्यादा ही तंग करने लगे हैं, और उसका मुख्य कारण है तापमान का बढ़ना और जंगल अंदर के तालाब-पोखर का सुख जाना। पानी की तलाश में जानवर गाँव किनारों के जंगलों को ठिकाना बना लेते हैं जिसके कारण आदिवासी जंगल अंदर वनोत्पादों के लिए जा नहीं पा रहे, ऐसे में न तो आमदनी हो रही है और न ही आने वाले महीनों में ठीक से कृषि हो पाएगी।

जंगलों से पत्ते तोड़कर लाती महिलाएं

हर साल की भांति इस साल भी तेंदू पत्ता तोड़ाई का काम भीषण गर्मी में हुआ है लेकिन इस साल की गर्मी अन्य सालों की अपेक्षा ज्यादा ही है। आदिवासियों के लिए तेंदूपत्ता तोड़ाई से होने वाले लाभ उनके रोजगार का अहम हिस्सा हैं, तेंदू पत्ता तोड़ाई से मिलने वाले पैसे से वो लोग अपने खेती करवाते हैं। लेकिन इस साल जंगली सुअर और हाथी के डर से जंगल किनारे बसे गाँव के लोग अपनी क्षमता से कम ही तोड़ पाएं हैं। जंगली सुअर और हाथी जैसे जानवर भीषण गर्मी के कारण जंगलों से गाँव की तरफ पानी की तलाश में जा रहे हैं जिससे लोगों का जानवरों से कभी-कभी आमना सामना भी हो रहा है, जिसके डर से आदिवासी अच्छे से तेंदू पत्ता नहीं तोड़ पा रहे हैं। कहीं-कहीं तो ये हाथी और जंगली सुअर ने बहुत नुकसान किया है। ग्राम मड़वामौहा में तेंदू पत्ता तोड़ने वाले लोगों पर जंगली सुअर ने हमला कर दिया था जिससे एक आदमी की मृत्यु हो गयी और 2 बुरी तरह से घायल भी हुए थे जिसे देख कर आस-पास के लोग बहुत डर गए। फिर गांव के कोटवार के द्वारा तेंदू पत्ता का तोड़ाई बंद करवाया गया। दोबारा तेंदूपत्ता तोड़ाई खुलने के बाद कुछ लोग बहुत कम पत्ता तोड़े पाएं है जिसका असर उनकी कृषि पर भी पड़ेगा।



जब मैं ग्राम तुमान के बुधवार सिंह कंवर से पूछा तो उन्होंने मुझे बताया कि उनके गाँव से 2 किलोमीटर की दूरी पर अमलडीहा गाँव है जहाँ की एक सब्जी बाड़ी को 24 हाथियों की झुंड ने पूरी तरह से बर्बाद कर दिया और कुछ कच्चे मकानों को भी नुकसान पहुचाये हैं जिसे देख आस पास के गाँव के लोहों में डर की भावना आ गयी है, जिसके चलते जंगलों में तेंदूपत्ता तोड़ने से लोग डर गए हैं। इन गांवों की सबसे बड़ी समस्या तो आस-पास रोजगार ना होना है इसलिए वे तेंदूपत्ता जैसे रोजगार पर निर्भर रहते हैं और ये जंगली जानवरों के डर से एकमात्र मौजूद इस कार्य को भी ठीक से नहीं कर पाते हैं।


दुनिया भर में लोगों द्वारा तेज़ी से आधुनिकीकरण की जीवनशैली अपनाने के कारण प्रकृति में बड़े परिवर्तन हो रहे हैं और यही कारण है कि आदिवासी भी अपने पारम्परिक जीवनशैली को बनाए रखने में असमर्थ हैं।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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