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खेलकूद एवं नृत्य-गान आदि प्रतियोगिता के जरिए अपनी संस्कृति को बचा रहे हैं छत्तीसगढ़ के आदिवासी

खेल मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। खेल को हर वर्ग के लोग खेलते हैं। खेल शारीरिक और मानसिक दृष्टि से चंचलता, चपलता, नियम और एक निश्चित दायरा सिखाता है। खेल समुदाय की संस्कृति और परंपरा को भी दर्शाता है। खेल के माध्यम से मनुष्य ही नहीं बल्कि जानवर भी बहुत कुछ सीखते हैं। ज़रूरत है तो सिर्फ़ इसे महत्व देने की है।


राष्ट्र निर्माण एवं नीति निर्धारण में युवाओं की भूमिका को सुनिचित करने के उद्देश्य से युवा कार्यक्रम तथा खेल मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा दिसम्बर के पहले हफ्ते में युवा महोत्सव का आयोजन का आयोजन किया गया, इसी अवसर पर छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में भी विभिन्न विद्याओं जैसे- लोक नृत्य, लोक गीत, पारम्परिक वेशभूषा, और खेल कूद का आयोजन कराया गया। शहरों से दूर बसे गाँव में, छिपी हुई प्रतिभा को निखारने एवं डूबती हुई कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ऐसा ही एक आयोजन विकास खंड सिंघिया में भी कराया गया।

कब्बड्डी और खो-खो खेलती लड़कियां

युवा खेल स्पर्धा, विकास खण्ड पोंडी उपरोड़ा में चयनित पांच कलस्टर, "सिंघिया, जटगा, पसान, कोरबी (चोटिया) और लेपरा" में कलस्टर स्तरीय तीन दिवसीय खेल प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। जिसमें ग्राम पंचायत गुरसियां की शासकीय हायर सेकेण्डरी स्कूल गुरसियाँ के मैदान में 01/12/2021 से 03/12/2021 तक आयोजित किया गया। जिसमें गुरसियाँ, बांधपारा, लालपुर, मानिकपुर, सरभोका, मड़ई, पाथा, धजाक, मदनपुर पंचायतें, निर्देशानुसार 15 से 40 वर्ष आयु के और 40 से ऊपर वर्ष आयु के महिला एवं पुरुष की टीम तैयार कर शामिल होने का निर्देश था। जिसमें अंतिम निर्णायक खेल में पहुंचने के लिए, खिलाड़ियों को एक दूसरे के विरुद्ध मैदान में उतारा गया।


तीन दिन के इस प्रतिस्पर्धा में 'लेपरा कलस्टर' के सरभोका पंचायत से महिला टीम (खो-खो एवं कबड्डी के लिए) और मानिकपुर से पुरुष टीम (खो-खो और कबड्डी के लिए) अंतिम निर्णायक खेल (फाइनल) हेतु, विकास खण्ड स्तरीय प्रतिस्पर्धा 'सिंघिया' के मैदान में खेलने के लिए चुना गया। अन्य चार क्लस्टर जटगा, पसान, कोरबी (चो.), सिंघिया भी अपना प्रतिभागी लेकर शामिल हुए। निर्णायक खेल के लिए चुनी गई लेपरा क्लस्टर से ग्राम पंचायत सरभोका के सरपंच श्रीमति गुरबाहर टोप्पो कहती हैं, "गांव में महिलाओं (गृहणी, मांओं) को इस तरह की प्रतिभागी के लिए, जैसे निक्कर, टी-शर्ट पहन कर लोगों के सामने खेलना, सायद प्राथमिकता के नजर से नहीं देखा जाता। जिस कारण से हमें (लोगों की मानसिकता बदलने के लिए), उपसरपंच- श्रीमति रामेश्वरी बिंझवार, मैं श्रीमति गुरबाहर क्रांति टोप्पो (सरपंच), आंगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमति जमुनावती, सहायिका श्रीमति रीता केरकेट्टा, आ. बा. कार्यकर्ता श्रीमति हलाजो मिंज, श्रीमति राजकुमारी बिंझवार, श्रीमति श्यामा बिंझवार स्कूली छात्रा आरती बिंझवार को शामिल कर खेल की शुरुवात की, और ग्राम से ही खिलाड़ियों को चयन कर फाइनल मैच खेलने के लिए सिंघिया विकास खण्ड स्तरीय खेल में शामिल हुए। जहाँ हमने कबड्डी प्रतियोगिता में प्रथम स्थान और खो-खो में द्वितीय स्थान प्राप्त कर ग्राम पंचायत के लिए मेडल प्राप्त किये। अब हमारा टीम जिला स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेगी और आने वाले समय में हम हर उम्र के महिला - पुरुष को इस महोत्सव में शामिल कर सकें, ऐसा माहौल तैयार करेंगे।

लोक नृत्य और संगीत का प्रदर्शन किया जा रहा है।

वहीं सांस्कृतिक कार्यक्रम में सामूहिक नृत्य में लखनपुर के कलाकरों को प्रथम पुरस्कार मिला। सामूहिक नृत्य में लखनपुर के कलाकार छत्तीसगढ़ की पारंपरिक संस्कृति के ऊपर केवल मांदर की थाप (ध्वनि) पर बगैर गीत के ही "नवरात्र भरनी, कर्मा, बार" आदि में बजाई जाने वाली मांदर की थाप पर नृत्य करके, उपस्थित लोगों एवं निर्णायक दल के समक्ष प्रस्तुति कर छत्तीसगढ़ की अनूठी परंपरा से अवगत कराते हुए मन को मोह लिया। श्री शिवभरोष लकड़ा जी (जनपद सदस्य, क्षेत्र क्रमांक- 09 ) कहते हैं कि, "मैं सरभोका के महिलाओं को तहे दिल से धन्यवाद देता हूँ एवं बधाईयां देता हूँ कि कबड्डी और खो-खो प्रतियोगिता में प्रथम और द्वितीय स्थान प्राप्त कर, हर स्तर पर हमारा सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है। इनकी हुनर को देखकर लोग मुझे एवं हमारी इस टीम को बधाईयां देते हैं। मुझे खेद है कि हम पंचायत स्तर पर समय के कमी के कारण प्रचार प्रसार नहीं कर पाए। और कुछ ही विधाओं पर हमने अपना प्रतिभागियों को उतार पाए। आने वाले समय में हम हर विधा पर अपने क्षेत्र से एक हुनर को उतारेंगे।"

आज आधुनिकता एवं काल्पनिक फिल्मी दुनियां की ताना बाना के प्रभाव से कोई भी क्षेत्र हो या वर्ग हो, इसके प्रभाव से अछूता नहीं है। आज खेल कई तरह के हैं कुछ शिक्षाप्रद हैं तो कुछ हानिकारक, जो बच्चों एवं युवाओं के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालता है। आधुनिकता का आदिवासियों पर उनके वेशभूषा, भाषा, कला, संस्कृति, खेलकूद, आदि पर गहरा प्रभाव पड़ा है। आदिवासियों के लिए यह एक चुनौती बन गया है कि वे अपनी पहचान कैसे बचाए? इन्हें कैसे संजोए? इस तरह की आयोजन, हर स्तर पर, प्रचार प्रसार के साथ आदिवासियों की जीवन शैली, संस्कृति, परंपरा आदि पर प्रकाश डालते हुए की जाए तो इनकी पहचान और स्तर को और ऊंचाइयों तक लाया जा सकता है।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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