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क्या है उरांव समुदाय की 'तहरी मंडी' और उसके रीति रिवाज?

"त्योहार", त्योहार कोई भी हो, उसके नाम मात्र से ही, उस दिन हो रही गतिविधियों की छवि हमारी आंखों के सामने आ जाती है। दीपावली में भी ऐसे ही अनेकों छवि हमारे मन में उमड़ने लगती है। शहरी परिवेश में दीपावली के त्योहार के समय हमारे मन में, रंग बिरंगी झालरों की सजावट, जगमगाती लाइट्स, और आँगन की खूबसूरत रंगोलीयों की छवि दिखाई पड़ती है। पर पटाख़ों की शोर और चुंधियाने वाली उजालों से हम जो पर्यावरण के साथ कर रहे होते हैं, यह हक़ीक़त हमें दिखाई नहीं देती है। लेकिन गाँवों का परिवेश ऐसा नहीं है, जैसे कि लगभग हर त्योहार में होता है, दीवाली के समय भी आदिवासी पूरे रीति रिवाज़ों के साथ प्रकृति के प्रति आभार ही प्रकट करते हैं।

छत्तीसगढ़ में गोंड, कंवर, बिंझवार, भैना, भतरा, उरांव, मुंडा, कमार, हल्बा, बैगा, भारिया, नगेशिया, मझवार, खैरबार, और धनुहार जैसे लगभग 42 जनजातियां हैं। जो शहरों से दूर बीहड़ जंगलों, और गाँवों में निवास करते हैं। इन सभी समुदायों की अलग-अलग रूढ़िवादी परंपराएं, मान्यताएं, पहनावा-ओढावा, रहन -सहन, बोली-बतास, नाचा ₹-गाना, एवं गीत-संगीत हैं, और यह विभिन्नता इन समुदायों को अधिक रोचक एवं मनमोहक बनाता है। मान्यताएँ और परमपरायें के अलग होने के कारण ही इन्हें अलग-अलग समूहों में रखा गया है।


अन्य समुदायों जैसा उरांव जनजाति में अलग तरह से दीवाली मनाई जाती है। उरांव जनजाति से आने वाले, जिला कोरबा के ग्राम पंचायत सरभोका निवासी 70 वर्षीय श्री नैहरसाय एक्का जी दिवाली त्योहार के बारे बताते हुए कहते हैं, "हमारा 'कुडुख' (उरांव) समुदाय भी दिवाली त्योहार को मानती है। दिवाली त्योहार को हम सोहरई परब, या गोयसाली पूजा कहते हैं। हम मिट्टी से बनी दिया का ही उपयोग करते हैं। मुख्य पूजा स्थान पर घर के अंदर और गोयसाली (कोठा) में तरह-तरह के आकृति वाले दिया को नहीं जलते, सादा दिया ही जलाते हैं। दिया के नीचे कोसना की सीथा (राईस बीयर का पका हुआ चांवल) को रखते हैं। और घर के चारों ओर ठाठ ( मिट्टी वाले घर की छत खप्पर पर) में ऐंरडी पत्ता को खोंचते (लगाते) हैं।

गोयसाली (कोठा) में रखा दिया

सोहरई परब में हम गोयसाली (कोठा, जहाँ मवेशियों को रखा जाता है) में अपने पूर्वजों के नाम पर पूजा अर्चना करते हैं, और गोयसाली (कोठा) में ही 'तहड़ी मंडी' (चावल और मुर्गा मांस को एक साथ पका कर बनाया जाता है) बना कर खाते हैं। इसलिए हम इसे गोयसाली पूजा भी कहते हैं। इस दिन दो जगह तहड़ी मंडी बनती है, पुरुषों के लिए गोयसाली में और महिलाओं के लिए घर में बनती है।


कोठा में हम उरांव जनजाति के लोग, गोत्र के अनुसार अलग अलग रंग की मुर्गा -मुर्गी की बलि देते हैं। मेरे एक्का परिवार में एक तमोना मुर्गा (लाल रंग का) और एक कसरी मुर्गी, पूर्वजों की नाम पुकार कर, अपने परिवार की, धन संपत्ति, गाय बैल आदि की रक्षा करने और आने वाले दिनों में दुःख के समय हमारी गुहार को सुनने की बात कहते हुए, मुर्गियों को चावल खिलाकर बली देते हैं। यह मान्यता है कि, यदि मुर्गा या मुर्गी दोनो चावल को चुग कर खाते हैं तो समझा जाता है कि पूर्वजों ने हमारी पुकार स्वीकार कर ली। मुर्गा की बलि हम सिर काट कर देते हैं और मुर्गी को 'पचबाल' (सिर को मुट्का से मार के) बलि देते हैं। और 'झरा' (कोसना/ राइस बियर कहते हैं।) को पूजा स्थान पर चढ़ाते हैं। मुर्गी मांस को घर के अंदर और मुर्गा मांस को गोयसाली (कोठा) में ही चावल के साथ पका कर प्रसाद के रूप में, परिवार के सदस्य साल के पत्तों से बनी पतरी (पत्तल) में ही निकाल कर ग्रहण करते हैं। अन्य बर्तनों में नहीं खाया जाता। जूठी पत्तल को जिस चूल्हे से तहड़ी मंडी बनाया गया होता है उसी चूल्हे में डालकर जला दी जाती है। घर के बनी तहड़ी मंडी सिर्फ़ महिलाओं के लिए होता है, और गोयसाली (कोठा) में बनी तहडी मंडी सिर्फ़ पुरुषों के लिए। घर की महिला मुखिया ही, घर के बाहर (यानी गाय कोठा में बनी भोजन को) बनी तहड़ी मंडी को ग्रहण कर सकती है। यदि तहड़ी मंडी बच जाता है तो उसे दूसरे दिन सूर्योदय से पहले ज़मीन में मिट्टी के नीचे दबा दिया जाता है। इस तहड़ी मंडी को हम अन्य जाति वाले लोगो को नहीं देते।

बलि से पूर्व मुर्गा को पूजा का चावल खिलाया जा रहा है

इस परब में मिठाईयां नहीं बनाई जाती है। इस दिन शकरकन्द, कोहड़ा (कद्दू), जोंधती (मक्का,भुट्टा), झुनगा आदि बीजों को उबाल कर, मवेशियों को दाना खिलाते हैं और खुद भी खाते हैं। बची हुई तहड़ी मंडी को फेंकना, दूसरे जाति के लोगों को खिलना, जूठी पत्तल को फेंकना, यह सब कार्य घर के मनता (भगवान) के मर्जी के खिलाफ है, या ऐसा करना घर में कलेश का कारण समझा जाता है। इसलिए सतर्कता बरती जाती है।"


देश दुनिया बदल रही है, आधुनिकता का प्रवेश हमारे आदिवासी गाँवों में भी होने लगा है, अतः कुछ-कुछ लोग इन परंपराओं से दुर होते जा रहे हैं, पर अनेकों ऐसे हैं जो अपनी पूर्वजों की अनोखी परंपराओं को बेझिझक मानते आ रहे हैं। युवाओं को बढ़-चढ़कर इन रीति रिवाजों में भाग लेना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी परंपराओं और संस्कृति को भूले न।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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