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क्या हसदेव जंगल के कटने से आदिवासियों का आस्तित्व खतरे में है?

Updated: Jan 20, 2023

हम विगत दो वर्षों (कोरोना काल) में यह जान चुके हैं कि ऑक्सीजन मानव जीवन के साथ-साथ अन्य जीवों के लिए कितना आवश्यक है। ऑक्सीजन तब सम्भव है, जब हमारे आस पास हरा भरा पेड़ पौधा हो, जंगल हो। 'जंगल' आदिवासियों का कला, संस्कृति, भाषा, वेशभूषा, को समेटे हुए जीवकोपार्जन एवं प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर, जनजातियों का प्राकृतिक धरोहर है। विकास के नाम पर हो रही आदिवासी रहवास क्षेत्रों का भूमि अधिग्रहण कर जंगलों की कटाई एवं आदिवासियों का विस्थापन मूल जनजातियों की कला, संस्कृति, भाषा और वेशभूषा पर गहरा प्रभाव डालता है।

हसदेव अरण्य कोरबा, सरगुजा, सूरजपुर जिला के बीच में मौजूद एक घना जंगल है। जिसके आसपास मुख्यतः गोंड, उरांव, लोहार, पंण्डो, धनुहार, मझवार, बिंझवार आदि जनजातियों का निवास है। यह क्षेत्र संविधान के पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आता है। 'हसदेव अरण्य', लगभग 1,70,000 हजार हेक्टेयर में फैला, घना एवं सन्निहित, मध्यभारत का एक मात्र सबसे बड़ा जंगल है। जो जैव विविधता और खनिज संपदा से भरपूर है, इसमें विभिन्न प्रकार के वन्य प्राणी जिसमें हाथी, भालू, चिता कई प्रकार तितलियां, दुर्लभ वनस्पतियां आदि मौजूद हैं।

परसा खदान जंगल (फेस टू) की रखवाली करते आदिवासी

'कोल बेयरिंग एक्ट' के तहत खदानों का आवंटन, जंगलों की कटाई एवं स्थानीय लोगों की विस्थापन इस क्षेत्र का एक बड़ा सवाल है। सवाल इसलिए क्योंकि यह क्षेत्र पांचवी अनुसूची में शामिल है जहां पेशा कानून लागू होता है। और संविधान से चलने वाला भारत देश में आदिवासियों को प्राप्त अधिकार को नजर अंदाज करके पूंजीपतियों के हित में 'कोल बेरिंग एक्ट' को प्राथमिकता देना, जो जंगल, वन प्राणी और आदिवासियों की कला, संस्कृति एवं उनके अस्तित्व को ही समाप्त कर रहा है। जंगलों को उजड़ता देख हसदेव अरण्य क्षेत्र में आदिवासियों का विरोध एवं विरोध का समर्थन शीर्ष पर है। 4 अक्टूबर से 13 अक्टूबर तक, फतेहपुर-सरगुजा से रायपुर के लिए, आदिवासियों का तीन सौ किलोमीटर की शांति पूर्ण पैदल यात्रा की गई। इस यात्रा में लगभग 300 लोगों ने भाग लिया था।

परसा कोल ब्लॉक को बढ़ाने के लिए, दूसरे फेस की खनन हेतु पेड़ों की कटाई की जानी है। जिसमें धरना प्रदर्शनकारियों के अनुसार "लगभग दो लाख से अधिक पेड़ कटेंगे। जिसके लिए परसा कोल ब्लॉक में लगभग चार सौ पुलिस फोर्स, तीस - पैंतीस मशीन, और दो ढाई सौ मजदूर लाकर, पेड़ों की कटाई के लिए तैयारी की जा चुकी है। यह तैयारी तब की जा रही है जब आदिवासियों की तीज त्यौहार का समय है, कोल ब्लॉक की यह संदेहात्मक गतिविधि, से ग्रामीण सचेत हो गए और कोल ब्लॉक की गतिविधि पर नजर रखने के लिए अब आदिवासी महिला पुरुष रात दिन डेरा डाल कर जंगल की रखवाली कर रहे हैं।"


आदिवासी कृषि, पशुपालन आदि करने एवं लघुवनोपज सहेजने में निपुण हैं।

उमेश्वर सिंह आर्मो जी ने आदिवासियों का 'उत्थान से पतन की ओर' के कारणों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि, "हमारी जो पेशा है लघु वनोपज है, कृषि है और पशुपालन है। पशुपालन के लिए आप कोई प्रावधान किये हैं? सरकार की जो पुनर्वासनीति है वहां कहीं हमारे पशुओं के लिए जगह नहीं है। हमारे जो लघु वनोंपज है जिसमें हम लाखों रुपए की आमदनी जंगल से लेते हैं। तो उस सारे चीजों से वंचित करके सिर्फ पैसा को पकड़ा देता है तो कहीं न कहीं उसका गलत उपयोग हो जाता है।"

परसा खदान के लिए विस्थापित केते गांव की जीता जागता उदाहरण बताते हुए कहते हैं, "जैसे हम जहां बैठे है उसके बगल में केते गांव था, वो केते गांव उजड़ गई, और आज उसकी स्थिति भनायक एवं खतरनाक है। लोग कहां हैं यह नहीं पता, परसा की कई ऐसे उदाहरण है, जिनको करोड़ो में लोगों मुआवजा मिला था, आज फिर वही व्यक्ति जंगल जाता है जंगल से लकड़ी काटता है और लकड़ी बेचता है तो उसका डेली का जीवन यापन हो रहा है। तो ऐसे स्थिति आठ से दस साल में हो गई है। उसका करोड़ो रुपए कहां चला गया यह एक उदाहरण है। इसलिए जो जहां कहीं भी आदिवासियों का विस्थापन किया जाता है विस्थापन के नाम पर वो पतन की ओर ही जाता है। इसका बड़ा कारण है कि जो सरकारी योजनाएं हैं, उसमें बहुत सारी खामियां हैं उसको कभी भी ठीक नहीं किया गया।"


आदिवासियों की संस्कृति जंगल से जुड़ी है। शहरों की नजरिए से यह एक मनोरंजन मात्र है।

आर्मों जी कहते हैं। "आदिवासियों का जो भौगोलिक क्षेत्र होता है, उस भौगोलिक क्षेत्र में एक भाषा, एक परंपरा, एक रितिरिवाज सारे चीज वातावरण में निर्मित होता है। और उस चीज को उस जगह से हटा दिया जाए तो वह टूटता है, जैसे हमारा करमा त्योहार, करमा त्योहार व्यक्तिगत नहीं है, करमा त्योहार हमारा सामूहिक रूप से होते हैं। जितने भी हमारे आदिवासियों का त्योहार है उनमें सामूहिकता है। अब उसको वहां से हटा के तीतर बितर कर देगें तो जरूर वो टूटेगा, उससे बिखरेगा, आप नहीं संजो सकते, मैं हसदेव क्षेत्र में रहता हूं, मुझे यहां से विस्थापित कर दिया जाता है, मैं बिलासपुर चला जाता हूं क्या वो बिलासपुर में करमा नृत्य होता है?, सामूहिक होती है, नहीं होती है। उसको एक सिर्फ मनोरंजन के रूप में माना जाता है। हम जब पेड़ को रोक रहें हैं की पेड़ नहीं काटेंगे उस पेड़ में भी "करमी" की पेड़ है, उसकी पूजा करते हैं, वो हमारे आत्मा से जुड़ा हुआ है। तो अगर उसे आप अलग कर दोगे तो कैसे वो बचेगा, संभव ही नहीं है बचना।"


"जंगल कटाई" आदिवासियों की अस्तित्व, वन्यजीवों की आशियाना, तथा किसानों की लगभग चार लाख हेक्टेयर सिंचित भूमि को भी प्रभावित कर रहा है।

'वे बताते हैं' "पांचवी अनुसूची का जो एरिया है, वहां लघुवनोंपाज और खेती से निर्भर होते है। जब विस्थापित होंगे तो हमारा खेती चला जायेगा, हमारा लघुवनोंपज जो जंगल से मिलता है वो चला जायेगा। यहां जंगली जो जीव निवास करते हैं उनका भी आशियाना खतम हो जायेगा। जो हसदेव नदी है उसका केचमेंट एरिया है, पूरे जो हसदेव का इलाका है, यहां से ही छोटे नदी जाकर हसदेव से मिलते हैं। उस नदी पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। हसदेव नदी जो जांजगीर, चंपा, बिलासपुर का जो क्षेत्र है वहां चार लाख हेक्टेयर कृषि जमीन को सिंचित करती है, तो वो किसान भी उस संकट से गुजरेंगे, और हमारा छत्तीसगढ़ जो है बर्बादी की ओर चली जायेगी। तो इसलिए हसदेव को बचाना जरूरी है।"


श्री हरिप्रसाद गोंड़(उम्र 80 वर्ष) जी ने कहा की "हमर जगह जमीन भागाथे, हमन कहां जाई, हमर नान लाईका हे ओमन भटक हीं..गली गली। तेखार बार हमन जंगल ला बचाथन।"


बासेन ग्राम के निवासी हरिप्रसाद पोर्ते (उम्र 19 वर्ष) बताते हैं, "वो बोलते हैं कि विकास हो रहा है, पर हकीकत कुछ और ही है। सबसे पहले कंप्यूटर यहां लाया गया था, एक महीना कंप्यूटर चला जिसमें मैं भी स्टूडेंट था। और पांच सिलाई मशीन लाया गया था यहां बासेन में। तो उसको सिखाया जा रहा था महिला लोग सीखे नहीं और एक महीना बाद ले गए मशीन सब को। जंगल न जाना पड़े इसलिए मशरूम उत्पादन का उद्योग किया गया था बासेन में, "घर-घर मशरूम उगा कर खा सकते हो जंगल जाना नहीं पड़ेगा, ऐसा कहा गया , वो भी कुछ नहीं है अभी। पिछले वर्ष हम लोग बोले अडानी से कि रोड बनवा दो रोड भी नहीं बनवाया। और बोले कि यहां लाईट खराब हो गया है लाईट बनवा दो कोई नहीं बनवाया। हम लोग कई बार सूचना भी दिए हमको काम दिलाइए लेकिन किसी को काम में नहीं लिया। जो हम लोग लिस्ट बनाए थे गांव में उनमें से कोई भी काम में नहीं लगे। और हैंडपंप खराब होता था उसको भी नहीं बनवाया। खदान आगे बढ़ने लगा उसको विरोध करने लगे, तो अडानी वाला जाके पोस्टर लगाया है, रिक्सा सेवा, एंबुलेंस सेवा, हैंडपंप खराब हो तो कॉल करें ऐसे कुछ पोस्टर लगा कर पूरे बस्ती में लगा दिया है। पर सब धोखा है।"


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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