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भोजली महोत्सव के जरिए प्रकृति के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं गोंडी आदिवासी

आज पूरा मानव जीवन कुशल मंगल है तो उसके पीछे प्रकृति की भूमिका सबसे बड़ी है, इसके बिना पृथ्वी में जीवन की परिकल्पना भी नहीं किया जा सकता है। प्रकृति से मिलने वाले संसाधनों की वजह से सिर्फ़ मनुष्य ही नहीं बल्कि समस्त जीव-जंतु एवं पेड़-पौधे लाभान्वित होते हैं, और हम सभी प्रकृति का ही एक हिस्सा भी हैं।

गाँवों तथा जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदायों को प्रकृति का महत्व अच्छे तरह से पता है, यही कारण है कि, उनकी पूरी जीवनशैली में प्रकृति के साथ तालमेल बना हुआ रहता है।

बूढा देव एवं भोजली माता

शहर में रहने वाले लोगों में प्रकृति के प्रति वो सम्मान नहीं होता है, जो गाँव के लोगों में होता है, यही कारण है दिन प्रतिदिन शहरों में जीवनयापन करना दूभर होता जा रहा है।


आदिवासी समुदायों में होने वाले पर्व त्योहार, उनके रीति रिवाज, एवं सभी परम्परायें प्रकृति के इर्द गिर्द ही रहती हैं। अन्य आदिवासी समुदायों की तरह छत्तीसगढ़ के गोंडी समुदायों के भी पर्व त्योहारों में प्रकृति के प्रति सम्मान झलकता है। गोंडी समुदाय के लोग प्रकृति के प्रति अपना आभार जताने के लिए एक उत्सव मनाते हैं, जिसे भोजली महोत्सव कहा जाता है।

धरती के पांच मूल तत्वों को कलश के रूप स्थापना किया गया है

बरसात के दिनों में जब नदी नाले उफ़ान पर होते हैं और चारों तरफ हरियाली छायी होती है उसी सावन की पूर्णिमा के दिन गाँव-गाँव में भोजली महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस दिन गोंडी रीति-रिवाजों के साथ प्रकृति की पूजा अर्चना किया जाता है।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है भोजली दो शब्दों से बना है, भूमि और जल। गोंडी समुदाय के लोग इन दोनों को प्रकृति की शक्ति के रूप में देखते हैं। भोजली पर्व की शुरुआत सावन पूर्णिमा के 7 दिन पहले से हो जाता है, इस दिन सभी महिलाएं अपने घर में बांस के छोटे-छोटे टोकरी में सात प्रकार के अन्न के बीजों को अंकुरित करने के लिए डाल देते हैं और प्रतिदिन भोजली माता की घर में ही सेवा करते हैं।


श्रावण पूर्णिमा के दिन सभी भोजली माताओं को एक जगह एकत्रित करने के लिए गोंडी वाद्य यंत्रों के साथ पूरे गाँव में भ्रमण किया जाता है, इस दौरान गोंडी साज-बाज, गोंडी नृत्य और गोंडी वाद्य यंत्रों की एक अलग ही छटा दिखाई पड़ती है। भ्रमण के दौरान प्रत्येक घर से भोजली माता रूपी बाँस की टोकरी को बाहर निकाला जाता है।

गाँव के लोग भोजली माता के सेवा गीत गाते रहते हैं, छत्तीसगढ़ के लोक गीतों में ये सेवा गीत बहुत ही अधिक प्रचलित हैं।


"देवी गंगा देवी गंगा लहर तुरंगा हो हमरो भोजली दाई के भीगी अठोअंगा, जय हो देवी गंगा"

इस गीत को छत्तीसगढ़ के कई सारे लोक कला मंच गाया जाता है और यह आज छत्तीसगढ़ी नहीं अपितु पूरे भारत में छत्तीसगढ़ की लोक गीतों के नाम से जाना जाता है। इस गीत में माता भोजली दाई एवं मां गंगा का बखान किया जाता है।


सभी भोजली माताओं को गांव के ईश्वर गौरी गौरा चौकी में एकत्रित कर रात भर सभी लोग उनकी सेवा करते हैं, उनके गीत गाते हैं, तथा रात में गोंडी नर्तक दलों द्वारा गोंडी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी वाचन किया जाता है। इस पूरे कार्यक्रम में गोंडी समुदाय के सभी व्यक्ति अपने पारंपरिक वेशभूषा में रहते हैं। महिलाएं साड़ी में और पुरुष धोती में रहते हैं, सभी को इस वेशभूषा में रहना अनिवार्य होता है। रात भर यह कार्यक्रम चलता रहता है।

माता भोजली की स्वागत में गोंडी नृत्य दलों की प्रस्तुति

उसके बाद सुबह सुबह माता भोजली को गंगा स्नान के लिए लेकर जाया जाता है, जिसमें अपार संख्या में श्रद्धालु दिखाई देते हैं। माँ भोजली की यह यात्रा दूर से ही दिखाई पड़ जाती है, एवं मिलों तक इसके संगीत को सुना जा सकता है। बहुत ही सुंदर गीतों और गोंडी वाद्य यंत्रों के धुन के साथ गंगा स्नान की यात्रा निकलती है इसे देखने के लिए बाहर से भी लोग आए हुए रहते हैं। भोजली माता को स्नान करा कर इस कार्यक्रम का समापन किया जाता है।

भोजली माता को गंगा स्नान के लिए ले जाते लोग

भोजली महोत्सव का आयोजन हर साल गोंडी धर्म जागरण समिति छत्तीसगढ़ के सदस्यों द्वारा किया जाता है। समिति के प्रांतीय सह सचिव गजानंद नुरूटी जी ने मीडिया से बातचीत के दौरान बताया कि "आदिकाल से हमारे पूर्वजों द्वारा यह पर्व मनाया जाता रहा है, शहरी संस्कृति के विस्तार होने के कारण यह परंपरा भी विलुप्त के कगार पर पहुंच चुकी थी, इस परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए गोंडवाना गुरुदेव के सानिध्य में पिछले 8 सालों से भोजली महोत्सव राजधानी में धूमधाम से मनाया जा रहा है, अब हमारे गोंडी धर्म जागरण समिति के सदस्य अपने-अपने जिलों में भी इसे मनाने लगे हैं।"


आज इस भोजली महोत्सव को छत्तीसगढ़ राज्य के अलावा झारखण्ड, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, जहाँ भी गोंडी समुदाय के लोग रहते हैं वहाँ यह भोजली महोत्सव को मनाया जा रहा है। स्थान के अनुसार इस महोत्सव को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे:- भुजरियां, कजरी, फुलरिया, धुधिया,आदि। इस भोजली महोत्सव में मातृशक्ति की बहुत बड़ी योगदान रहती है एवं इस महोत्सव से आज पूरे गोंड़ आदिवासी समुदाय एक हो रहे हैं।


यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है जिसमें Prayog samaj sevi sanstha और Misereor का सहयोग है l


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