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गांव के किसान सेमी की खेती कैसे करते हैं

पंकज बांकिरा द्वारा सम्पादित


सेमी का उपयोग सब्जी के रूप में होता है। इसकी सब्जी बना कर, इसका सेवन चावल के साथ किया जाता है। सेमी के फल में कॉपर, आयरन, मैग्निशियम, फॉस्फोरस, प्रोटीन, कैल्शियम जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो मनुष्य को सेहतमंद बनाता है और मानव शरीर के लिए बहुत लाभकारी माना जाता है। सेमी की सब्जी के सेवन से गला, पेट-दर्द और सूजन आदि में राहत मिलता है और सर्दियों के मौसम में सेमी का फल निकलना स्टार्ट होता है।


सेमी की खेती करने के लिए, पहले खेत को सेमी लगाने लायक करना पड़ता है। खेत की दो बार जोताई करवाना पड़ता है। उसके बाद रोटोवेटर से मिटटी को तोड़ा जाता है, फिर मिटटी के छोटे हो जाने के बाद, उसमें नाली निकालना पड़ता है। फिर सेमी के बीज को एक-एक करके लगाना पड़ता है, उसके बाद उसमें पानी देने के लिए 'डीरीप पाइप' को, सभी नालियों में लगा कर बीजों को पानी दिया जाता है। और बीज, पौधा के रूप में निकलना चालू करता है। सेमी के जो पहले पत्ते निकलते हैं, उसमें किट लगने लगता है तो, उसमें किटनाशक का छिड़काव किया जाता है। सेमी जो है, वह लता वाला सब्जी रहता है, उसे ऊपर उठाने के लिए सहारे की जरूरत पड़ती है। उसके लिए किसान द्वारा, सेमी को सहारा देने के लिए बांस गाड़ा जाता है। साथ ही लताओं को सहारा देने के लिए, तीन लाइनों की तार भी खींची जाती है। इन तीनो लाइनों को पार करते ही सेमी में फूल लगना चालू हो जाता है। इसके फूलों में कीट और फंगस लगने का डर भी रहता है, इसके लिए स्पीयर के माध्यम से फंगीसाइड और कवज जैसे दवाइयों का छिड़काव करना पड़ता है। तब जाकर सेमी का फूल सुरक्षित रह पाता है।

सेमी का खेत

तस्वीर में आप देख सकते हैं कि सेमी का एक खेत है, जो कितना घना दिखाई दे रहा है। सेमी लताएं वाला सब्जी है, इसलिए आस-पास उसकी लताएं फैल कर, काफी घना हो जाता है। फूल लगने के बाद, सेमी मैं फल लगना स्टार्ट होता है। फल में जब फंगस लग जाता है, पूरा फल काला हो जाता है। सेमी का फल बड़ा होने पर, वो तोड़ने लायक हो जाता है।

सेमी तोड़ते हुए मजदूर

आमतौर पर सेमी तोड़ने के लिए एक किसान चार-पांच मजदूर की मदद लेकर, सेमी तोड़वाता है। सेमी में पहली बार फल लगने पर, कम मात्रा में फलता है। जब सेमी एक बार टूट जाता है, फिर नए फल के आने पर उसमें पिछले बार के मुकाबले उसमें काफी ज्यादा मात्रा में दूसरी बार में फल होते हैं। इसके फल पहली बार में इतना अच्छा नहीं निकलता, जितना निकलना चाहिए। जब फल टूटते जाते हैं, फिर इनका फलना अधिक होते जाता है।

सेमी जमाते हुए किसान का बेटा

सेमी को तोड़ते समय, कैरेट में जमा करना पड़ता है। एक कैरेट में जमा करने पे लगभग 10 किलो सेमी आ जाता है। इस प्रकार से, संपूर्ण सेमी को कैरेट में जमा किया जाता है। और नजदीकी मंडी में, जहां सेमी का उचित मूल्य मिल जाए, वहां 20 से 25 कैरेट लेकर बेचने ले जाते हैं।


ग्राम बीजझोरी के रहने वाले जलेश साहू, जो अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपने खेती-बाड़ी में भी ध्यान देती हैं। उनका कहना है कि, "सेमी दो प्रकार के होते हैं, एक बिजनेस लेवल का सेम, जिसकी पैदावार अधिक होती है और उसका कलर हरा रहता है, मार्केट में उसकी कीमत थोड़ी कम रहती है और एक सफेद सेमी होता है, जो फलता तो कम है, लेकिन उसकी कीमत अधिक रहती है। यदि सेमी को बेचने के लिए लगा रहे हो तो, हरा वाला सेमी अच्छा रहता है सफेद वाले सेमी की तुलना में, क्योंकि इससे अधिक आमदनी होता है।"


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।


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