top of page

जानिए गोंडी आदिवासियों के पर्व, सृष्टि दिवस के बारे में

आदिवासियों की जीवन पद्धति पूर्ण रूप से पारम्परिक रहा है, और यह प्राचीन काल से चलता आ रहा है। आदिवासी ही इस पृथ्वी के प्राचीन निवासी हैं, और वे प्रकृति के पुजारी भी हैं। आदिवासी प्रकृति से जुड़े विज्ञान को भी सबसे अच्छी तरह जानते और समझते हैं। जीवन से सम्बंधित अनेकों पहलुओं के बारे में वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं द्वारा जिन चीज़ों के बारे अभी बताया जा रहा है उनके बारे में आदिवासियों द्वारा पहले ही बताया जा चुका है। आदिवासी हमेशा से ही प्रकृतिवादी रहे हैं।


गोंडी आदिवासी लोगों का एक महत्वपूर्ण पर्व है सृष्टि दिवस, यह पर्व फाल्गुन पूर्णिमा के दिन हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन सृष्टि का पहला पहला पुंगार (फुल) खिला था। इस पर्व में सर्वप्रथम गाँव के जिमेदारीन, ठाकुर देव एवं गाँव के देवी देवताओं को संज्ञाकालीन सेवा गोगो कर कार्यक्रम की ओर अग्रसर होते हैं। गाँव में देव गुड़ी को पलाश के फूलों से माला बानाकर तोरण तैयार कर श्रृंगार किया जाता है। फागुन पुर्णिमा को रात्रि में यह कार्य आरंभ करते हैं जिसमें घरों से कलश निकालकर गुदुम बाजा बजाते हुए गीत गाते हुए देव गुड़ी में लाया जाता है । पलाश पेड़ के पत्ते, फुल, छाल, फल, बीज सभी उपयोगी हैं और ये गुणकारी औषधि भी हैं। आदिवासी समाज के लोग इसी मुराल (पलाश) के फुल का रंग भी बनाते हैं। पलाश फूल के पानी से अनेक प्रकार की बीमारियां दुर हो जाती है, शरीर को शितलता मिलती है और चेहरे की रौनकता बढ़ जाती है।

पलाश के फूलों से सजाया गया देव गुड़ी

बुजुर्गों द्वारा इन कलशों को फेरे लागाकर रखा जाता है और पुजा अर्चना की जाती है। कार्यक्रम में मातृ शक्ति, पितृ शक्ति, लया लयोर शक्ति सभी पारम्परिक वेशभूषा में मौजूद होते हैं। बुजुर्गों को सम्मानपुर्वक स्वागत कर के आसन ग्रहण कराया जाता है। कर्मा नतृक दल द्वारा नृत्य गान होता है और बुजुर्गों द्वारा सृष्टि दिवस की महिमा के बारे में जानकारी दी जाती है।

कलश लाते ग्रामीण

आदिवासीयों का कोई भी पर्व प्रकृति के ख़िलाफ़ नहीं है, सभी पर्व-त्योहार, रीति-रिवाज प्रकृति के साथ सामंजस्य में ही है। इन पर्वों में प्रदुषण का कोई स्थान नहीं है। आदिवासी समाज के हर पर्व कोई न कोई फसल की सेवा गोगो करते हैं, अर्थ यह है कि उस विकसित फसल के प्रथम उत्पादन के उपभोग की शुरुआत अपने पेन पुरखा शक्ति पर सेवा अर्पण कर धन्यवाद ज्ञापित करते हैं।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

Comments


bottom of page