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आइए जानते हैं, लोहे की खोज करने वाले अगरिया समुदाय के बारे में

आज के समय में जब हम लौह उत्पादन की बात करते हैं तो टाटा स्टील जैसी बड़ी कंपनियों के नाम हमारे दिमाग में आते हैं। लेकिन सदियों पहले से अगरिया जनजाति के लोग लौह उत्पादन और उससे औज़ारें बनाने का कार्य करते आ रहे हैं। इसी जनजाति के लोगों ने सबसे पहले लोहे के बारे जाना था। आज भी इस समुदाय के कई लोग लोहे बनाने का कार्य करते हैं, गैंती, फावड़ा, कुल्हाड़ी, हंसिया आदि औजारों को बनाकर या मरम्मत कराकर वे अपने जीवन का गुजारा कर रहे हैं।


आदि काल से ही अगरिया जनजातियों के लोगों के जीवन यापन का मुख्य आधार लोहा निर्माण करना रहा है l इन्होंने पाषाण काल से ही लौह पत्थर का पहचान कर उसको लोहे में परिवर्तित करते आए हैं। इस लोहे का उपयोग से विभिन्न प्रकार के औजार बनाया जाता रहा है।

लौह सुधार कार्य करते हुए धन सिंह अगरिया जी

हमने धनसिंह अगरिया जी से बातचीत की, उनका मुख्य धंधा लोहे से संबंधित कार्य ही है और इसी के माध्यम से इनके पूरे परिवार का भरण पोषण होता हैl धन सिंह जी का उम्र 41 वर्ष हैं, वे सुबह उठते ही अपनी दुकान पर बैठ जाते हैं क्योंकि लोहे बनवाने के लिए अनेक ग्रामीण उनके पास पहुंच जाते हैं। एक लोहे को सुधारने के लिए वे 30 से 40 रुपया तक लेते हैं तथा नया लोहा बनाने पर 100 से 200 रुपए उनको मिलता है।

खेती-बाड़ी के मौसम में तथा मनरेगा के कार्यों के वक़्त उनकी आमदनी बढ़ती है क्योंकि इस समय लोहे से संबंधित कार्य बढ़ जाते हैं l वे एक छोटी सी झोपड़ी में अपने साजो-सामान लिये प्रतिदिन कार्यकरते हैं l उनके कार्य कुशलता को देख कर पूरे गाँव वाले उन्हीं के पास लोहा सुधरवाने और नया लोहा बनवाने के लिए जाते हैं।

हमने धनसिंह जी से लोहा बनाने वाले यंत्रों के बारे जाना। लोहा बनाने या किसी लोहे को सुधारने के लिए कुछ जरूरी उपकरण की आवश्यकता होती है, जैसे:- चरखी, एक तरह का पंखा ही होता है, इसके साथ एक पाइप जुड़ा होता है जो जिसका दूसरा हिस्सा चूल्हे के साथ जुड़ा होता है, इस चरखी से चूल्हे में हवा पहुंचाई जाती है।

साथ में हतौड़ी, निहाई, संशी (चिमटा), पानी रखने के लिए छोटा सा मिट्टी का घड़ा, बैठने के लिए पीढ़ा आदि चीज़ों की आवश्यकता होती है।


इसके बदले में अगरिया आदिवासी ₹50 से लेकर ₹100 तक का कमाई एक लोहा के पीछे मिल जाता है l इस प्रकार लगभग एक माह में 1000 से ₹2000 तक घर बैठे अपना आमदनी बना लेते हैं l लोहा बनाने का रीति रिवाज इनके पूर्वजों से चली आ रही है जिसको हर पीढ़ी दर पीढ़ी इस कार्य को करते आ रहे हैं lऔर अपनी संस्कृति तथा परंपरा को बरकरार रखें हैं l

धनसिंह अगरिया जी का दुकान

छत्तीसगढ़ की कोरबा वनांचल क्षेत्र में अगरिया जनजाति समुदाय के लोग रहते हैं l जिनका मुख्य व्यवसाय लोहा बनाना एवं लोहा सुधारने का कार्य है यही उनके जीवन यापन करने का मुख्य आधार है l यह प्राचीनतम समय से ही लोहा निर्माण का कार्य करते आ रहे हैंl हमने कोरबा जिले के पोड़ी उपरोड़ा ब्लॉक में निवास करने वाले धनसिंह अगरिया जी से मुलाक़ात की, जिनसे हमने जाना की लोहे को कैसे बनाया जाता है l अगरिया जनजाति के ऊपर सरकार भी विशेष रुप से ध्यान नहीं दे पा रही है जिससे उनका विकास रुका हुआ हैl शिक्षा के क्षेत्र में यह बहुत पिछड़े हुए हैं क्योंकि इनका निवास शहरों से दूर पहाड़ी क्षेत्र की तरफ है जिधर ना तो शिक्षा पहुंच पाती है और ना ही सरकार की विभिन्न प्रकार की योजनाएं जिससे वे अनभिज्ञ होते हैं और सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते है l इन्हें विकास की बहुत ही जरूरत है l क्योंकि लोहे को किस प्रकार बनाया जाता है लोहा पत्थर की पहचान कैसे होती है यह केवल अगरिया जनजाति समुदाय के लोगों को ही पता है l वर्तमान में टाटा कंपनी जैसे अन्य लोहा निर्माण कंपनियां तैयार हो चुकी है जो मशीन के माध्यम से लोहा बनाने का कार्य कर रहा है जिसमें उत्तम क्वालिटी की कमी है lलेकिन जो अगरिया द्वारा लोहा का नवनिर्माण किया जाता हैं उसमें कभी जंग नहीं लगता इसकी सत प्रतिशत संभावना है l इस प्रकार से अगरिया जनजाति अपने कार्य के अनुसार अपनी पहचान बना रही है लेकिन सरकार इनके ऊपर ध्यान नहीं दे रही है l आप हम सभी मिलकर इनकी विकास के बारे में विचार करें और इनका सहयोग करें जिससे इनको उचित स्थान और उनके कार्य अनुसार उनको दर्जा और सम्मान मिल सकेl


यह लेखAdiwasi Awaaz प्रोजेक्टअंतर्गत लिखा गया है जिसमें प्रयोग समाज सेवी संस्थाऔर Misereor का सहयोग है


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