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बिजली कटौती और बढ़ते हुए बिजली बिल से परेशान हैं ग्रामीण आदिवासी

छत्तीसगढ़ के अलग होने से पहले यहाँ बहुत कम ही क्षेत्रों में बिजली पहुँची थी, लोग अपने घरों में बड़ी-बड़ी लकड़ियों को जलाकर उजाला करते थे, और ठंडी में शरीर को गर्म रखते थे। उस वक़्त कोई भी कार्य बिजली पर निर्भर नहीं होती थी। बिजली आज के जमाने में हवा पानी जैसा ही एक जरुरी तत्व बन गया है, गाँव हो या शहर अब आलम यह है कि, यदि बिजली न हो तो जीना मुश्किल हो जाता है। मनुष्य अपनी सुविधा के लिए अनेकों यंत्र बना लिया है, अब हर घर में बिजली से संचालित होने वाले उपकरण देखने को मिल जायेंगे, जैसे पंखा, बल्ब, मिक्सर, मोबाइल आदि। कोरोना की वजह से अब तो पढ़ाई भी ऑनलाइन होने लगी है, ऐसे में मोबाइल आदि उपकरणों के लिए बिजली तो अति जरूरी चीज़ बन गई है।


हमारे छत्तीसगढ़ में बिजली उत्पादन के कई साधन हैं, बड़े-बड़े बिजली संयंत्र भी हैं जिससे सिर्फ़ छत्तीसगढ़ को ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों को भी बिजली मिलती है। उजाला करता है, केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं छत्तीसगढ़ से बाहर अन्य राज्यों तक भी बिजली पहुंचाते है। छत्तीसगढ़ की नदियों पर अनेकों बांध बनाए गए हैं, जिससे बिजली उत्पादन हो सके।

घर पर लगा हुआ बिजली का मीटर

1 नवंबर सन 2000 को मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ में अनेकों निजी और सहकारी विद्युत सयंत्रों का निर्माण हुआ है। जैसे-जैसे लोग आधुनिकीकरण के प्रभाव में आकर भिन्न-भीन्न विद्युत उपकरण खरीद रहे हैं, विद्युत की खपत बढ़ रही है और माँग भी तेज़ी से होने लगा है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा बिजली बिल की रकम में तो छूट दी गई है लेकिन गाँव में बिजली इतनी कटती है, कि बिजली का होना या न होना बराबर है।

नियमित रूप से बिजली न मिल पाने के कारण गाँवों में लोगों को काफ़ी परेशानी हो रही है, आदिवासी किसान, जिनकी कृषि सिंचाई पर निर्भर होती है। अगर आसमान में बादल आ गए या बारिश की संभावना दिखने लगे, फिर तो बिजली का जाना निश्चित हो जाता है। कभी-कभी तो 7-15 दिनों तक बिजली कटे रहती। परंतु जब बिजली का बिल बनता है तो रकम बढ़ा हुआ रहता है।


'बिजली बिल हाफ' जैसी योजनाएं तो हमारे छत्तीसगढ़ में चल रही हैं, लेकिन आज भी बिजली बिल कई लोगों के घरों में इतने अधिक आ रहे हैं कि, वे उस रकम को चुकाने की स्थिति में नहीं हैं। श्री नीलकंठ जो ग्राम पंचायत बिंझरा कोरबा जिला के ग्राम पंचायत बिंझरा निवासी श्री नीलकंठ जी ने बताया कि, उनहें कुछ ही महीनों में 20000 रुपये का बिजली बिल जमा करने को कहा गया है। जबकि उनके घर में दो बल्ब के अलावा कोई भी विद्युत उपकरण नहीं है। नीलकंठ जी बताते हैं कि "हमें कहा गया कि महीनों से बिल नहीं जमा करने के कारण इतना ज्यादा का बिल बना है, जबकि हम हर महीने बिल भरते आ रहे हैं। हमारे घर में बीपीएल के अंर्तगत मीटर लगा है, फ़िर भी इतना अधिक बिल कैसे बन गया? मैं पिछले कई दिनों से बिजली ऑफिस का रोज चक्कर काट रहा हूँ, लेकिन अभी तक कोई भी हल नहीं हुआ है"


लचर व्यवस्था और सुचारू रूप से कार्य न होने के कारण नीलकंठ जैसे अनेकों ग्रामीण आदिवासियों को बिजली की यह मार झेलनी पड़ रही है। छत्तीसगढ़ का अलग राज्य बनने के बाद बिजली तो गाँवों में पहुंच रही है लेकिन योजनाओं का सही क्रियान्वयन न होने से और नियमित रूप से बिजली न मिल पाने से आदिवासियों को ढेरों समस्या का सामना करना पड़ रहा है।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।


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