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सोमा मुंडा की हत्या और स्वशासन पर प्रहार, क्या सुरक्षित है आदिवासी परंपरागत व्यवस्था?

आदिवासी समुदाय की सदियों पुरानी स्वशासन परंपरा पर आज लगातार सीधे प्रहार की खबरें सामने आ रही हैं। अब गाँव उस रूप में नहीं रहे, जैसे कभी आदिवासी समाज ने उन्हें स्थापित किया था। वह समय कुछ और था, जब स्वशासन व्यवस्था में बैठे लोग पूरे गाँव के लिए सम्मानित माने जाते थे और रक्षक के रूप में देखे जाते थे। गाँव वाले उनकी हर बात को स्वीकार करते थे और उनका निर्णय सर्वोपरि होता था।


आज वही स्वशासन व्यवस्था कमजोर की जा रही है, और उसी कड़ी में एदेल सांगा पड़हा राजा सोमा मुंडा की नृशंस हत्या ने पूरे आदिवासी समाज को झकझोर कर रख दिया है।


कौन थे सोमा मुंडा?

सोमा मुंडा, खूंटी ज़िले के चलागी गाँव के निवासी थे। वे आदिवासी समाज की दृष्टि से सामाजिक रूप से सजग, वैचारिक रूप से परिपक्व और राजनीति को गहराई से समझने वाले व्यक्ति थे। जब भी वे किसी मंच से अपनी बात रखते थे, तो नीतिगत और तर्कपूर्ण ढंग से रखते थे। पेशे से वे एक प्रधानाध्यापक भी थे।


सोमा मुंडा जी एदेल सांगा के पड़हा राजा थे। पड़हा राजा मुंडा समुदाय के किली के प्रमुख व्यक्ति होते हैं। मुंडा समुदाय के अनुसार एक किली अर्थात सरनेम (सामान्य समझ के लिए) में एक पड़हा राजा होता है। सोमा मुंडा जी का किली एदेल सांगा था, इसलिए उन्हें एदेल सांगा पड़हा राजा कहा जाता था।


उसी तरह हर किली में एक पड़हा राजा होता है। 22 गाँव मिलकर एक पड़हा राजा बनाते हैं। अलग-अलग किली के अलग-अलग पड़हा राजा होते हैं, जैसे- धनवार के पड़हा राजा बिरसा धनवार हैं, भेंगरा के पड़हा राजा सनिका भेंगरा हैं और आंईद के पड़हा राजा मंगल आंईद हैं।


राँची ज़िले के राहे प्रखंड स्थित कटेया डीह गाँव के निवासी मनोहरण लाल मुंडा, जो एक लेखक भी हैं और 'उलगुलान करो आज' पुस्तक के लेखक हैं, बताते हैं-

“सोमा मुंडा जी पेशे से शिक्षक थे और वे आदिवासी दृष्टिकोण से शिक्षा के महत्व को भली-भांति समझते थे। वे हमेशा सोचते रहते थे कि कैसे हमारे आदिवासी समाज को शिक्षा के मार्ग पर आगे बढ़ाया जाए।”


उस समय चलागी और आसपास के क्षेत्रों में कोई उच्च विद्यालय नहीं था। इसी कारण पड़हा राजा सोमा मुंडा ने अपनी ही ज़मीन पर बिरसा उच्च विद्यालय चलागी की नींव रखी। वे स्वयं इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक भी थे।

यह एक गैर-सरकारी विद्यालय है, जिसमें कक्षा 6 से 10 तक की पढ़ाई होती है। यह विद्यालय अंग्रेज़ी माध्यम से संचालित होता है।


पड़हा राजा सोमा मुंडा जी अबुआ झारखंड पार्टी के केंद्रीय कार्यकारी अध्यक्ष भी थे। वे 2024 में खूंटी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव भी लड़ चुके थे।


7 जनवरी, 2026 को पड़हा राजा सोमा मुंडा जी के साथ ऐसी घटना घटी कि पूरे आदिवासी समाज में आक्रोश फैल गया। वे अपने विद्यालय के कुछ काम से अपनी पत्नी अमृता मुंडा जी के साथ खूंटी गए हुए थे। ठीक शाम 6 बजे खूंटी से वापस आ रहे थे, तो खूंटी के जमुवादाग रोड पर स्थित तालाब के पास अज्ञात अपराधियों द्वारा पड़हा राजा सोमा मुंडा जी को गोली मारकर हत्या कर दी गई। उसके बाद उन्हें K S Ganga Hospital and Research Centre लाया गया, जहाँ चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।


रातभर में यह संदेश आग की तरह फैल गया और 8 जनवरी, 2026 को खूंटी कोल्हान बंद करने का एलान किया गया।

पड़हा राजा सोमा मुंडा जी की पत्नी अमृता मुंडा ने 8 जनवरी को खूंटी में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान कहा कि-

“पड़हा राजा सोमा मुंडा इसी जल, जंगल, जमीन के लिए आवाज़ उठाते थे, और आज शहीद हो गए। आज हम सरकार से मांग करते हैं कि झारखंडियों के जल, जंगल, जमीन को न लूटा जाए। यहाँ के खनिज संपदा यहीं के लोगों को मिले। यहाँ के खनिज संपदा को दूसरे लोग लूटकर न ले जाएँ। इसलिए हमेशा हमारे परिवार में इस पर बात होती थी और लोगों को एकजुट भी करते थे। जहाँ-जहाँ हमारे लोगों पर आफ़त आती थी, जमीन-जगह की लूट होती थी, मार-काट होती थी, वहाँ समाज में शांति बहाल करने के लिए हाज़िर होते थे। हमारे पड़हा राजा किसी एक जाति, एक धर्म, एक संप्रदाय के लिए नहीं, बल्कि सबके लिए सोचते थे। समाज में शांति व्यवस्था बनाए रखना चाहते थे, ताकि सब लोग शान से अपने परिवार और समाज में सुख-चैन से रह सकें।

यही बातें मेरे पास बोलकर गए थे।”


जल, जंगल और जमीन के रक्षक थे सोमा मुंडा

सोमा मुंडा जी सामाजिक कार्यों में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे, क्योंकि वे सामाजिक व्यवस्था के पड़हा राजा थे। पड़हा राजा का कर्तव्य था कि अपनी समुदाय की रक्षा करना तथा उनकी संस्कृति, पहचान और जमीन की रक्षा करना। यह दायित्व उनके ऊपर था। मुंडा जी पड़हा बैठकों के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि लोग जागरूक रहें। इसलिए वे प्रत्येक पड़हा बैठक में जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों पर लोगों को लगातार सचेत करते थे।

इसके साथ ही वे अपने पड़हा क्षेत्र से बाहर भी काफ़ी सक्रिय रहते थे। उन्होंने कई बड़े आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। उनमें प्रस्तावित कोयल कारो बाँध परियोजना का भी विरोध किया और इसके विरुद्ध आंदोलन किया। जानकारी के अनुसार इस बाँध की परिकल्पना 1950 के दशक में की गई थी। वर्ष 1973 की एक रिपोर्ट के अनुसार इस परियोजना से 125 गाँवों के विस्थापित होने की आशंका थी, जबकि स्थानीय लोगों के अनुसार इससे लगभग 256 गाँव प्रभावित होते। इस परियोजना के कारण लगभग 50,000 एकड़ भूमि बाँध के पानी से डूब क्षेत्र में आने की आशंका थी। इसी वजह से क्षेत्र के लोगों ने व्यापक आंदोलन छेड़ा। अंततः वर्ष 2003 में तत्कालीन झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने इस परियोजना को रद्द कर दिया, जबकि इसकी औपचारिक निरस्तीकरण संबंधी अधिसूचना वर्ष 2010 में जारी की गई।


इसी प्रकार रांची खूंटी क्षेत्र में बढ़ते शहरीकरण के कारण स्थानीय, भोले-भाले आदिवासियों की जमीन पर जमीन माफियाओं द्वारा लगातार कब्ज़ा किया जा रहा था। बाहरी लोगों के माध्यम से भी बड़े पैमाने पर आदिवासी जमीन की लूट हो रही थी। सोमा मुंडा ने इन जमीन माफियाओं के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाई। उन्होंने लोगों को जागरूक कर संगठित किया और कई स्थानों पर आदिवासियों की जमीन बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इतना ही नहीं, खूंटी जिले के अड़की प्रखंड में प्रस्तावित स्वर्ण खनन, जिसमें 14 गाँवों के विस्थापित होने की आशंका है, उसके विरोध में भी वे विस्थापितों के पक्ष में खड़े होकर आवाज उठा रहे थे। बताया जाता है कि उनकी आखिरी सभा 30 नवंबर को अड़की प्रखंड के कोरवां गाँव में एक आमसभा के दौरान हुई थी।


उन्होंने अड़की प्रखंड के कोरवां मौजा की आम सभा में कहा था—

“अब आप सभी को जागना होगा और अपनी जमीन बचानी होगी, नहीं तो स्वर्ण खनन के नाम पर इस अड़की प्रखंड के 14 गाँवों को विस्थापित कर दिया जाएगा। जोजोबेडा उलीहुड़ङ, जहाँ स्वर्ण खनन का केंद्र है, वहाँ से 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाली सारी जमीन अधिग्रहित कर ली जाएगी। सरकार के लिए आदिवासियों की जमीन लूटना कोई नई बात नहीं है। यदि हम इसके खिलाफ नहीं लड़े, तो भले ही वे जमीन के बदले जमीन दे दें, लेकिन याद रखें कि वह जमीन आपकी खुंटकट्टी जमीन है। आप सभी जानते हैं कि खुंटकट्टी जमीन यूँ ही नहीं मिली है, इसे प्राप्त करने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ा है। इसलिए हम सभी को सचेत रहना होगा।”


झारखंड आंदोलन में भी सोमा मुंडा की भूमिका ऐतिहासिक रही। उन्होंने एन. ई. होरो जैसे दिग्गज नेताओं के साथ मिलकर अलग झारखंड राज्य के लिए संघर्ष किया। उनके लिए झारखंड केवल एक भू-राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि आदिवासी सम्मान, भाषा, संस्कृति और अधिकारों का प्रतीक था। राज्य बनने के बाद भी उन्होंने संघर्ष नहीं छोड़ा, क्योंकि वे जानते थे कि सत्ता परिवर्तन से अधिकार स्वतः नहीं मिलते, उन्हें लगातार लड़कर हासिल करना पड़ता है।


सोमा मुंडा कॉरपोरेट परस्त नीतियों और सांप्रदायिक राजनीति के कट्टर विरोधी थे। वे आदिवासी समाज को धार्मिक उन्माद में बाँटने की हर कोशिश के खिलाफ खड़े रहे और आदिवासी एकता को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। उनके लिए संघर्ष का रास्ता नफरत नहीं, बल्कि चेतना, संगठन और संवैधानिक मूल्य थे।


आज जब शहीद सोमा मुंडा हमारे बीच नहीं हैं, तब उनकी विचारधारा और संघर्ष पहले से अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। उनकी शहादत हमें याद दिलाती है कि न्याय, जल-जंगल-जमीन और स्वशासन के लिए लड़ाई आसान नहीं होती, पर इतिहास वही रचते हैं जो डर के सामने झुकते नहीं।


शहादत के इतिहास में एक और नया अध्याय

पड़हा राजा सोमा मुंडा केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वे आदिवासी स्वशासन, जल-जंगल-जमीन और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए खड़े एक जीवंत आंदोलन थे। आज खूंटी में उन्हें गोली मारकर जिस तरह से हत्या की गई, वह केवल एक नेता की हत्या नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, संवैधानिक अधिकारों और जनसंघर्षों पर सीधा हमला है। शहीद सोमा मुंडा की शहादत झारखंड के इतिहास में एक ऐसा अध्याय जोड़ती है, जो आने वाली पीढ़ियों को अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देगा।


पड़हा राजा सोमा मुंडा की पूरी विचारधारा शिक्षा और संघर्ष पर आधारित थी। उनका स्पष्ट संदेश था:

“पढ़ो और लड़ो, अपने अधिकारों के लिए लड़ो।”


लेखक परिचय: झारखण्ड के रहने वाले नरेंद्र सिजुई जी इतिहास के छात्र हैं और आदिवासी जीवनशैली से जुड़े विषयों पर प्रखरता से अपना मत रखते हैं। वे वर्तमान में कई आदिवासी संगठनों में नेतृत्व की भूमिका में हैं, ALM के राज्य समन्वयक हैं।

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