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पक्षी प्रेमी कैसे चला रहे हैं लॉकडाउन में अपना व्यवसाय?

हर व्यक्ति का अपना-अपना एक शौक होता है और वे उस कार्य में बहुत दिलचस्पी रखते हैं। भले ही उन्हें उस कार्य में कितनी भी मेहनत क्यों न लगे वे उसे सरलता से कर लेते हैं। अधिक शौकीन लोग तो अपनी जान तक की परवाह नहीं करते हैं।

तालाबंदी के बाद पक्षियों की खरीद धीमी हो गई है

वैसे तो जानवरों और पक्षियों से इंसान का प्यार कोई नयी बात नहीं है। युगों से इंसान पशु-पक्षियों से प्यार करता रहा है। दुनिया में कई सारे लोग हैं, जो पक्षियों और जानवरों से बेहद प्यार करते हैं। कई लोगों ने कुत्ता, बिल्ली जैसे जानवरों को कुछ इस तरह अपना लिया है कि वे उन्हें अपने घर-परिवार का बेहद अहम हिस्सा मानते हैं। कई लोग ऐसे भी हैं जो जानवरों को अपने बच्चे मानते हैं और वे उनका पालन-पोषण वैसे ही करते हैं, जैसे कि इंसानी बच्चों का किया जाता है। पशु-पक्षियों से इंसान के बेइंतहा प्यार के कई सारे दिलचस्प किस्से भी हैं।


आज मैं नगर पंचायत छुरी कला के भाठा पारा गया और मधुबन गोस्वामी से मिला। उनकी उम्र 65 साल है। उन्होंने हमें बताया कि उनके बेटे शेषबन गोस्वामी पशु-पक्षियों का बहुत बड़े प्रेमी हैं। उन्होंने अपने शौक की पूर्ति के लिए बहुत सारे पशु-पक्षियों को पाल रखा है और उनका पालन करके अपना व्यवसाय चला रहे हैं। शेषबन गोस्वामी विभिन्न प्रकार के जीव, जैसे खरगोश, गाय बैल, बतख, देहाती मुर्गा, कड़क नाथ मुर्गा, चाइना मुर्गा, बाज, कर्रा मुर्गा, कारी मुर्गा, कबूतर आदि का पालन करते हैं। इनके भोजन की व्यवस्था के लिए मार्केट से 1000 रुपये प्रति बोरी की दर से चारा खरीद कर लाते हैं। धान के भूसे को 5 रुपए प्रति किलो की दर से खरीद कर लाते हैं। कुछ और चारे की व्यवस्था अपने घरों से कर लेते हैं। जो चारा मार्केट से खरीद कर लाया जाता है उसको कबूतर और चाइना मुर्गी को खिलाया जाता है और भूसे को देहाती मुर्गी, कड़क नाथ मुर्गी, गाय, बैल जैसे और बहुत सारे जानवरों को खिलाया जाता है।


खरगोश के लिए दूबी घास को अपने बाड़ी से या बाहर से लाकर खिलाते हैं। वे चारे के लिए ज्यादा चिंता नहीं करते हैं। पशु-पक्षियों को वे अपने बाड़ी में छोड़ देते हैं। अपने भोजन का जुगाड़ वे खुद बाड़ी से कर लेते हैं। उनको सुबह बाड़ी में छोड़ दिया जाता है, शाम तक खुले रूप में रहते हैं। उनको कीड़े-मकोड़े जैसे बहुत सारे भोजन मिल जाते हैं। बतख पानी मे रहने वाला पक्षी है तो उसके लिए बाड़ी में छोटा सा कुआँ भी है जिसमें पानी हमेशा भर के रख दिया जाता है। इससे उस कुँए में कीचड़ होने के कारण कीड़े-मकोड़े उत्पन्न हो जाते हैं। वे उसी पानी में अपने भोजन की कुछ व्यवस्था कर लेते हैं। कुछ भोजन बाहर मिल जाता है। इस तरह सभी के लिए पर्याप्त मात्रा में भोजन की पूर्ति हो जाती है।


शेषबन गोस्वामी जी जंगली चीजों को रखने का बहुत शौक रखते हैं। जैसे कि उन्हें सर्प पकड़ना बहुत पसंद है। वे हमेशा जंगलो में सर्प पकड़ने की इच्छा रखते है और कभी-कभी जंगलो के तरफ घूमते रहते हैं। उन्हें किसी भी सर्प को पकड़ने में किसी भी प्रकार का डर नहीं लगता है। चाहे कोई भी सर्प हो वे उसे आसानी से पकड़ लेते हैं। चाहे सर्प कितना भी जहरीला क्यों न हो, शेषबन उसे पकड़ ही लेते हैं। उनके आस-पास के लोग कहते हैं कि उनको सर्प का कोई भी प्रभाव नही पड़ता है, तभी तो वो इतने जहरीले सांपों को पकड़ लेते हैं, जैसे अजगर, अहिराज, गौहा, करायत, डारडोमी आदि बड़े से बड़े जहरीले सांप को पकड़ते हैं। वे लगातार इस प्रकार के अलग-अलग जानवरों को खोज करते रहते हैं। वे सिर्फ अपने शौक की पूर्ति के लिए इन सभी प्रकार के जीवों को पकड़ते हैं।


शेषबन गोस्वामी जी के फॉर्म में उपस्थित सभी पक्षी पकड़ के नहीं लाये गए हैं। उनके यहाँ कई पक्षी ऐसे हैं जिन्हें वे खरीद के लाते हैं। उन्हें वे राजनांद गाँव से मंगाते हैं। लेकिन कोरोना काल के बाद उनके पास बहुत कम पक्षी रह गए हैं। कोरोना काल के पहले वे बहुत पक्षियाँ मंगाया करते थे, लेकिन कोरोना आने बाद एक बार भी नहीं मंगा पाए हैं। उनके यहाँ बहुत लोग पक्षी खरीदने पहुंचते हैं लेकिन वे सभी लोगों को नहीं बेचते हैं। लेकिन जब पहचान के करीबी लोग आ कर मांगते हैं तो उन्हें देना पड़ता है। इस कारण अब उनके पक्षी बहुत कम हो गए हैं। गाँव के बैगा झाड़फूंक करने के लिए लोगों से मुर्गी मंगाते हैं, जैसे कि कर्रा मुर्गा, उल्टी मुर्गी जैसे पक्षी। गाँव के लोग शेषबन जी के यहाँ से पक्षी लेकर जाते हैं। वे उसे बहुत अधिक कीमतों में बेचते हैं। प्रत्येक पक्षी से उनको 50 से 200 तक का फायदा हो जाता है जिससे उनको बहुत आमदनी भी हो जाती है ।


वे किसी भी पक्षी को गिनने का काम नहीं करते हैं, कबूतर तो कई सकड़ें हैं, कितनों को गिनते रहेंगे। कुछ लोग कुछ पक्षी ले भी जाते हैं तो उनको याद नहीं रहता है कि हमारे पास कितने कबूतर हैं। बतख, खरगोश और चाइना मुर्गी अब कम हो गए हैं तो उनको गिना जा सकता है। इन सबकी ज्यादा मांग होने के कारण उनकी संख्या कम हो गयी है। इसलिए उन्होंने पक्षियों को बेचना बंद कर दिया है। इसके कारण उनके व्यवसाय में थोड़ी मंदी आ गयी है।


इस शौक से होने वाली परेशानियाँ- कभी कभी समय के अनुसार या मौसम के बदलाव के कारण पक्षियों में बीमारियाँ लग जाती हैं जिससे पक्षी मरने लगते हैं। कुछ बीमारियाँ मच्छरों के काटने से हो जाती है।

जब भी इन पक्षियों पर बीमारियाँ आती है, उस समय बहुत परेशानी होती है और उस समय डॉक्टर की सलाह से पक्षियों को दवा देकर इलाज किया जाता है। कई बार तो बहुत सारे पक्षी मर भी जाते हैं, जिससे उस समय बहुत हानि होती है।


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