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बा: पर्व - हो आदिवासियों का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार

Updated: Feb 23, 2023

हो समुदाय के लोग हमेशा से ही प्रकृति के अनुरूप रहे हैं, चाहे उनका गतिविधि देखें या स्वभाव पूरी तरह से प्रकृति से ही जुड़ा हुआ है। हो समुदाय के मान्यता के अनुसार कोई भी चीज़ यदि नई हो तो उसके स्वागत के लिए पूजा अर्चना जरुर करना चाहिए अन्यथा अनहोनी होती है। ऐसा ही त्योहार है बा: पोरोब। बा: पोरोब हो आदिवासियों का दूसरा बड़ा महत्वपूर्ण त्योहार है। बा: का अर्थ फूल है अर्थात फुलों का त्योहार। बा: पोरोब प्रकृति को सम्मान देने के लिए ही मनाया जाता है, या कहें तो प्रकृति के स्वागत में ही बा: पोरोब मनाया जाता है। पतझड़ में पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और बसंत के आगमन के साथ ही पेडों में नए-नए पत्ते तथा फूल आ जाते हैं, ऐसा लगता है जैसे प्राकृति ने नया जन्म लिया हो।

दिउरी द्वारा देशाऊली में पूजा किया जा रहा है

बा: पोरोब साल वृक्ष के फूल को आधार मानकर ही मनाया जाता है। इस सृष्टि में साल का फूल सबसे निराला है, माना जाता है कि साल के फूल में सृष्टि के संरचना का राज़ छुपा हुआ है। हो समुदाय के लोग इससे बहुत अच्छे से समझते हैं इसलिए साल के वृक्ष को सम्मानपूर्वक अपने संस्कृति में अपनाए हुए हैं। साल के फूल की गरिमा वृक्ष से गिरने के बाद समाप्त हो जाती है इसलिए फूल के फूटने से पहले ही इसे पूजा अर्चना के लिए उपयोग किया जाता है।

बा: पोरोब चार दिनों तक मनाया जाता है।

1) बा: पोरोब कटब - इस दिन दिउरी एरा के द्वारा उपवास रखकर बा: पोरोब के लिए डियंग (हड़िया) बनाती है।

2) बा: गुरी - इस दिन घर और आँगन को गोबर से साफ़ किया जाता है।

3) बा: पोरोब - इस दिन दिउरी द्वारा देशाउली और हाम हो दुम (पुर्वजों) का पूजा किया जाता है।

4) बा: बासी - इस दिन साल के फूलों को गाँव के किनारे एक चिन्हित जगह में रखा जाता है। इसे गिडी बाहा भी कहा जाता है।


गाँव के दिउरी देशाउली स्थल में साल के फूलों से भरी डाली रखकर गाँव के रखवाला देवता देशाउली एवं पालन पोषण देवी जाएरा एरा की सूका संडी (मुर्गा) और ककार कलुटी (मुर्गी) की बलि देकर तथा डियंग रासी (हड़िया) आर्पित कर मसूर दाल और ईचा हाकु (चिगड़ी मछली) से पूजा आर्चना की जाती है। हर घर के आदिंग (पूजा घर) में साल का फूल रख कर मसूर दाल, ईचा हाकु एवं चावल की पूजा की जाती है। फिर गाँव के आखड़ा के बीच में साल की फूलों की डाली गाड़ी जाती है। इसके बाद रात भर जादुर (नाच-गाना) होता है। महिलाएँ और पुरुष सभी गीत गाते-गाते नाचते हैं, इसे ही जादुर कहा जाता है। नव युवक और युवतियां अपने खुशी, प्रेम भाव, दुःख, विपत्ति आदि गीत के मध्यम से प्रकट करते हैं। बाः पोरोब बासी में महुआ फूल और आम की पूजा भी की जाती है। इस पर्व के बाद से आदिवासी साल के नये पत्तों, नये आम के फल और महुआ फूल का प्रयोग करना शुरू करते हैं।

पारम्परिक वेशभूषा में नृत्य करती महिलाएं

बा: पोरोब को ले कर हो समुदाय में बहुत सारे दंतकथाएं हैं, उनमें से एक ये भी है कि अदिकाल में लुकु लुकुमी द्वारा मागे पर्व को मनाने के बाद पुजा में उपयोग होने वाला डिंयग का अत्यधिक सेवन के कारण बोंगा-बुरु का पुजा सम्मान सही से नहीं हो रहा था, जिससे नाराज हो कर बोंगा बुरु द्वारा भय एंव अशांति का माहौल बनाए जाने लगा। लुकु कोड़ा नशे मे चुर रहते थे और लुकु कुड़ी को जंगल एवं नदियों में दैनिक कार्य के दौरान बोंगाओं के द्वारा डराया जाने लगा। जब डर की सीमा असहनीय हो गई तो लुकु कुड़ी ग़ुस्से से नशे मे चुर लुकु कोड़ा को लात मारती है, जिससे लुकु कोड़ा का नशा उतर जाता है और लुकु कोड़ा लुकुमी से लात मारने का कारण पूछता है। लुकु कुड़ी विस्तार से सभी बातों को बताती है। लुकु कोड़ा ने लुकु कुड़ी से कहा कि अपने पति के अपमान के भरपाई हेतु जंगल से ऐसे वृक्ष के फूल लाओ जो कभी न मुरझाए, तभी मैं पूजा करूंगा। लुकु कुड़ी पति के मान-सम्मान के लिए जंगल के विभिन्न फूलों को लेकर आई लेकिन घर के आँगन तक पहुँचते-पहुँचते सभी फुल मुरझा जाते थे। इसी बीच उन्हें पाउड़ी बोंगा और जयरा बोंगा की बात सुनाई देती है। उन्होंने लुकुमी को सात पहाड़ पार साल वृक्ष के जंगल के बारे बताया। लुकुमी सात पहाड़ पार कर साल के फूल ले आती है और अपने पति लुकु को सम्मानित करते हुए देती है। लुकु हो देशाउलि में जा कर सुख समृद्धि की पूजा अर्चना करते हैं। पूजा के बाद बोंगाओं द्वारा जो भय और अशांति फैलाए जा रहे थे वो शांत हो गए थे। तब से पहले इस फूल की पूजा होती है फिर उसका उपयोग किया जाता है।


नोट - ये सारी जानकारियां हो समुदाय के जानकारों से बातचीत कर प्राप्त किया गया है।


लेखक परिचय:- चक्रधरपुर, झारखंड के रहने वाले, रविन्द्र गिलुआ इस वक़्त अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर कर रहे हैं, भारत स्काउट्स एवं गाइड्स में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हैं। लिखने तथा फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी करने के शौकीन रविन्द्र जी समाजसेवा के लिए भी हमेशा आगे रहते हैं। वे 'Donate Blood' वेबसाइट के प्रधान समन्वयक भी हैं।

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