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क्या वनोपज से छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की आर्थिक स्थिति बदल सकती है?

आदिवासी गाँव सामन्यतः जंगलों के आसपास ही होते हैं, और वे सभी प्रकृति पर ही निर्भर होते हैं। जंगलों में मिलने वाले फल, फूल, कंद, मूल, इत्यादि से ही उनका जीवन चलता आ रहा है। जंगल से मिलने वाले यह संसाधन रोजमर्रा की ज़िंदगी में तो काम आते ही हैं। बल्कि इन्हें बेचकर पैसा भी कमाया जा सकता है।

वनोपज इकट्ठा करके बेचना, आजीविका का एक अच्छा साधन है। ज्यादातर लोग लघु वनोपज इकट्ठा करते हैं, लघु वनोपज ग़ैरकाष्ठ उत्पाद के अंतर्गत आते हैं, गैरकाष्ठ के अंतर्गत सभी प्रकार के जंगली फल जैसे- मेवे, लाख, शहद, रेशम आदि आते हैं।


लघु वनोपज के अंतर्गत 52 उत्पाद हैं, जीनका समर्थन मूल्य तय किया गया है। महुआ फूल, महुआ बीज, हर्रा, बहेड़ा, चहांर आदि भी लघु वनोपज ही हैं। लाह उत्पादन भी कमाने का एक बेहतरीन जरिया है। कुछ ऐसे पेड़ हैं जिनमें लाह आसानी से आते हैं जैसे- कुसुम, पलाश, बेर इत्यादि। यह पेड़ भी गाँव तथा जंगलों में आसानी से उग जाते हैं।

छत्तीसगढ़ में वन धन योजना के अंतर्गत बागवानी और कृषि से संबंधित फसलों को खरीदना और उसका उचित मूल्य प्रदान करना है। छत्तीसगढ़ के लघु वन उपजों की अधिक बिक्री होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ को प्रथम पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है।


श्रीमती मालती ग्राम कोड़गार की आदिवासी महिला हैं, बातचीत के दौरान यह पता चला कि उनके खेतों और घर के आसपास महुआ के बहुत से वृक्ष हैं, जिनमें से वे साल भर के लिए महुआ फूल इकट्ठा कर लेती हैं। मालती जी लाह भी बेचती हैं और आसपास के पेड़ों से उन्हें बहुत अधिक मात्रा में लाह मिल जाता है।

उनका मानना है कि, इमली, चार, महुआ, साल, डोरी आदि फलों तथा उनके बीजों के दाम बढ़ते घटते रहते हैं, जिसकी वजह से उन्हें वह राशि प्राप्त नहीं हो पाती है, जो वह चाहती हैं। लेकिन लाह एक ऐसा वन उपज है, जिसका मूल्य हमेशा अधिक रहता है, और लाह को साल दो साल तक संरक्षित करके भी रखा जा सकता है।

कोड़गार की ही रहने वाली श्रीमती कदम कुंवर जी ने बताया कि वैसे तो हर्रा, बहेड़ा जैसे वृक्ष साल वृक्ष से कम हैं, लेकिन हर्रा और बहेड़ा के बीजों को ही इकट्ठा करके वे आय प्राप्त करती हैं। कदम जी महुआ के फूल को अधिक मात्रा में इकट्ठा कर उसे संरक्षित कर रखती हैं। महुआ के बीज जिसे डोरी कहा जाता है, उसे सूखा कर उससे फ़िर तेल निकाला जाता है उस तेल का प्रयोग सब्जी आदि पकाने में किया जाता है, और तेल निकालने के बाद बची खल्ली का इस्तेमाल साँप या बिच्छू को भगाने में किया जाता है। कदम जी ने बताया कि यदि घर में सांप या बिच्छू घुस जाते हैं तो डोरी के खल्ली को जलाकर धुँआ करने से भाग जाते हैं। कदम जी भी अपने घर के आसपास मौजूद कुसुम, पलाश और बैर के पेड़ों में लाह की कृषि करती हैं।

लघु वनोपज ना केवल वन वासियों के लिए ही बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ प्रदेश की आय में वृद्धि के लिए सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है। इन लघु वनोपजों की अब बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हो चुके हैं। गाँव-गाँव में लघु वनोपज को संग्रहण करने के लिए संग्रहण केंद्र बनाए गए हैं, और प्रत्येक गाँव में स्वंय सहायता समूह की महिलाओं द्वारा इन वन लघु उपज का संग्रहण घर घर जाकर किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी पहले से ही वनों के संसाधनों से अपना जीवन चलाते आएँ हैं, और अब सरकारी योजनाओं की वजह से यह अब आजीविका का अच्छा साधन बनता जा रहा है।


छत्तीसगढ़ प्रशासन द्वारा लघु वन उपज की बढ़ोतरी के लिए कई योजनाएं तैयार की जा रही हैं, जिसमें लोगों द्वारा जंगलों के पेड़ पौधों की कटाई पर रोक लगाई जा रही है, एवं अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने की सलाह दी जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में तेंदूपत्ता संग्रहण करने पर संग्राहकों को 100 तेंदूपत्ते के गड्डी का 500 रुपया दिया जाता है, और इसका बोनस राशि एक साल बाद प्राप्त होता है। तेंदूपत्ता संग्राहक के परिवार में अगर तेंदूपत्ता कार्ड धारी की मृत्यु हो जाती है, तो लघु वनोपज समिति के माध्यम से सहायता राशि के रूप में 35,000 रुपये की राशि प्रदान की जाती है, तेंदूपत्ता छात्रवृत्ति योजना के माध्यम से स्कूल के बच्चों को छात्रवृत्ति राशि प्रदान की जाती है। जिनके माता-पिता तेंदूपत्ता संग्रहण करते हैं उन बच्चों को छात्रवृत्ति भी प्राप्त होती है। छत्तीसगढ़ में 130 जिला यूनियन, 901 जिला प्राथमिक वनोपज सहकारी समिति, 10,300 संग्रहण केंद्र और 13.75 लाख परिवार तेंदूपत्ता संग्राहक के रूप में संग्रहण करते हैं।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।






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