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आइए जानें एक सप्ताह लगातार बारिश से आदिवासीयों का कैसे हुआ भारी नुकसान

पंकज बांकिरा द्वारा सम्पादित


जैसे कि आप सभी जानते हैं कि गांव के जो आदिवासी लोग हैं, उनके पास सिचांई के लिए बहुत कम साधन होते हैं। इसलिए वे बरसात के दिनों में गिरने वाली पानी में ज्यादा फसल बोते हैं और खेती करते हैं। लेकिन कभी-कभी अचानक भारी बारिश होने की वजह से उनकी फसल को भारी नुकसान होता है। उनकी फसल चौपट हो जाती है और उनकी सारी मेहनत बेकार हो जाती है। ठीक ऐसा हाल, विगत साल सिरकीकला के आदिवासियों का भी हुआ है।


आइए जानें उनके बारे में


आज (विगत वर्ष अगस्त माह) हम ग्राम-पंचायत बांझीबन के आश्रित ग्राम सिरकीकला गये थे। और वहां के आदिवासी, महेश्वर कंवर, इन्द्रपाल कंवर, घुरसिंह और दिलीप सिंह से मिलना हुआ। उन्होंने हमें बताया कि इस साल बहुत ही खण्ड वर्षा हुआ है। अभी पिछले जुलाई महीने में और अगस्त के पहले हफ्ते में, उनके गांव में खेती करने के लिए पानी नहीं था, चारों तरफ सूखा पड़ा था। गांव के केवल 25% लोगों के खेतों में पानी था। बाकी 75% लोगों के खेतों में पानी नही था। सारे लोग पानी के लिये तरस रहे थे।


इस साल देखा जाए तो पिछले साल के अपेक्षा खेती बहुत पीछे है। और गांव के आधे लोगों की खेती अभी भी बची हुयी है। महेश्वर कंवर के कुछ खेतों में पानी था, जिसमें वो काफी मेहनत करके धान का फसल लगाया था। और उसमें काफी पैसे भी खर्च किये थे। परन्तु अभी कुछ दिन पहले 9 अगस्त से 15 अगस्त तक, एक सप्ताह लगातार भारी बरसात के कारण, उनके खेतों का मेड़ फुट गया और मेड़ की सारी मिट्टी उनकी धान की फसलों में बिखर गया। जिसकी वजह से उनकी सारी फसल चौपट हो गयी।

मेड़ के टूटने से बर्बाद हुई फसल

इस बरसात के कारण उनको काफी नुकसान हुआ है, और उनकी इस फसल के नुकसान की भरपाई उनको शायद ही मिलेगा। ये अपने खेत की मेड को खुद मेहनत करके ठीक करते हैं या फिर अपने मेहनत की कमाई खर्च करके ठीक करवाते हैं। इनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नही है, इनके पिता का निधन एक साल पहले हो गया था। और महेश्वर कंवर की उम्र मात्र 20 वर्ष है।


इतनी कम उम्र में, घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण इनको घर का हर काम करना पड़ता है। खराब आर्थिक स्थिति का असर, इनकी पढ़ाई पर पड़ रहा है। इसलिए यह अपनी पढ़ाई पूरी नही कर पा रहे हैं। वह अत्यंत दयनीय जीवन-यापन कर रहे हैं। इनके साथ ललिता बाई कंवर से मिलें। उनका कहना है कि बारिश अधिक होने के कारण अपने घर की बाड़ी में रखे मखना, लौकी, रखिया, बरबट्टी और डोंडका नार सड़ने लगे हैं, और पूरी तरह मुरझा जा रहे हैं। और जो बचे हुए हैं, उसमें कीड़े लग रहे हैं। और इसके साथ-साथ जो मिट्टी घर है, उनके दीवाल टूटकर गिर गए हैं। यहाँ तक कि घर में खाना बनाने के लिये सुखी लकड़ी भी नही है, ऐसी स्थिति में खाना बनाना बहुत मुश्किल हो रहा है। इस तरह लगातार बारिश काफी नुकसान दायक साबित हो रही है।

लौकी का मुरझाया पौधा

अतः छतीसगढ़ सरकार से मेरा विनम्र निवेदन है कि गांव के रहने वाले वैसे आदिवासी लोग जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नही है, और जो केवल कृषि पर निर्भर रहते हैं, जिनकी फ़सल को अत्याधिक बारिश से भारी नुकसान हुआ है। उन लोगो को राहत के रूप में थोड़ी-बहुत रकम देना चाहिए। ताकि उनकी आर्थिक स्थिति में बुरा प्रभाव न पड़े और वे अच्छे से जीवन यापन कर सके।


साथ ही सभी लोगों से मेरा निवेदन है कि अगर हमारा आर्टिकल आपको अच्छा लगे तो लाइक और शेयर जरूर करें। धन्यवाद!


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।


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